अंधकार पर किया जानेवाला ध्‍यान तुम्‍हारे सारे पागलपन को पी जायेगा।




सिर्फ जापन में इस दिशा में इस कुछ प्रयास किया है। वे अपने पागल लोगों के साथ बिलकुल भिन्‍न व्‍यवहार करते है। यदि कोई व्‍यक्‍ति पागल हो जाता है विक्षिप्‍त हो जाता है, तो जापन में वे उसे उसकी जरूरत के मुताबिक तीन या छह हफ्तों के लिए एकांत में रख देते है। वे उसे सिर्फ एकांत में रहने के लिए छोड़ देते है। उसकी अन्‍य जरूरतें पूरी करते रहते है। वे उसे समय पर भोजन देते है। लेकि एक काम किया जाता है, राम में रोशनी नहीं जलाई जाती। उसे अंधेरे में अकेले रहना पड़ता है। निश्‍चित ही उसे बहुत पीड़ा से गुजरना होता है। अनेक अवस्‍थाओं से गुजरना पड़ता है। उसकी सब देख की जाती है, लेकिन उसे किसी तरह का साथ-संग नहीं दिया जाता। उसे अपनी विक्षिप्तता का साक्षात्‍कार सीधे और प्रत्‍यक्ष रूप से करना पड़ता है। और तीन से छह सप्‍ताह के अंदर उसका पागलपन दूर होने लगता है।
दरअसल कुछ नहीं किया गया, उसे सिर्फ एकांत में रखा गया है। बस इतना ही किया गया। पश्‍चिम के मनोचिकित्‍सक चकित है। उन्‍हें यह बात समझ में नहीं आती कि यह कैसे हो सकता है। वे खुद वर्षों मेहनत करते है। वे मनोविश्‍लेषण करते है, उपचार करते है। वे सब कुछ करते है। लेकिन वे रोगी को कभी अकेला नहीं छोड़ते। वे उसे कभी स्‍वयं ही अपने आंतरिक अचेतन का साक्षात्‍कार करने का मौका नहीं देते। क्‍योंकि तुम उसे जितना ही सहारा देते हो, वह उतना ही बेसहारा हो जाता है। वह उतना ही तुम पर निर्भर हो जाता है। और उतना ही तुम पर निर्भर हो जाता है। और असली सवाल आंतरिक साक्षात्‍कार का है। स्‍वयं को देखने का है। सच में कोई भी कुछ सहारा नहीं दे सकता हे। तो जो जानते है वे तुम्‍हें अपना साक्षात्‍कार करने को छोड़ देंगे। तुम्‍हें अपने अचेतन को भर आँख देखना होगा।

और अंधकार पर किया जानेवाला ध्‍यान तुम्‍हारे सारे पागलपन को पी जायेगा। इस प्रयोग को करो। तुम अपने घर में भी इस प्रयोग को कर सकते हो। रोज रात को एक घंटा अंधकार के साथ रहो। कुछ मत करो; सिर्फ अंधकार में टकटकी लगाओ, उसे देखो। तुम्‍हें पिघलने जैसा अनुभव होगा। तुम्‍हें एहसास होगा कि कोई चीज तुम्‍हारे भीतर प्रवेश कर रही हे। और तुम किसी चीज में प्रवेश कर रहे हो। तीन महीने तक रोज रात एक घंटा अंधकार के साथ रहने पर तुम्‍हारे वैयक्‍तिकता के, पृथकता के सब भाव विदा हो जायेगे। तब तुम द्वीप नहीं रहोगे,तुम सागर हो जाओगे। तुम अंधकार के साथ एक हो जाओगे।
और यह अंधकार इतना विराट है, कुछ भी उतना विराट और शाश्‍वत नहीं है। और कुछ भी उतना निकट नहीं है। और तुम इस अंधकार से जितने भयभीत हो त्रस्‍त हो उतने भयभीत और त्रस्‍त किसी अन्‍य चीज से नहीं हो। और यह तुम्‍हारे पास ही है, सदा तुम्‍हारी प्रतीक्षा में है।

ओशो
विज्ञान भैरव तंत्र विधि – 76




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