अनिद्रा [ Insomnia ] एक जीवन शैली है ! ~ ओशो




” अनिद्रा एक जीवन शैली है ! ” ~ ओशो

” अनिद्रा कोई बीमारी नहीं है। अनिद्रा एक जीवनशैली है। प्रकृति की ओर से मनुष्य को इस प्रकार बनाया गया है कि वह कम से कम आठ घंटे कड़ा श्रम करे। जब तक वह आठ घंटे कड़ा श्रम नहीं करता, तब तक सोने का अधिकार अर्जित नहीं करता और जैसे-जैसे कोई समाज समृद्ध होने लगता है, लोग ज्यादा मेहनत नहीं करते। उनके लिए काम करने की जरूरत नहीं रह जाती, उनका काम दूसरे कर देते हैं।

ये लोग सारा दिन ऐसे छोटे-मोटे काम करते हैं जिनको करने में इन्हें मजा आता है, लेकिन ये छोटे-मोटे काम उस तरह का कड़ा श्रम नहीं होते जैसा किसी लकड़हारे को या पत्थर तोड़ने वाले को करना पड़ता है। मनुष्य शरीर इस प्रकार से बना है कि आठ घंटे के कड़े श्रम के बाद उसे स्वभावतः नींद आ जाए, ताकि ऊर्जा फिर से ताजी हो सके, लेकिन जिसने बहुत धन कमा लिया हो उसे भी यदि आठ घंटे लकड़ी काटना पड़े तो वह कहेगा कि फिर इतने धन का क्या लाभ? लकड़ी ही काटनी थी तो वह बिना लखपति बने भी काटी जा सकती थी।

तो यदि अमेरिका में पाँच करोड़ लोग अनिद्रा के रोग से पीड़ित हैं, तो इसका इतना ही अर्थ है कि वे सो पाने का अधिकार अर्जित नहीं कर रहे। वे ऐसी परिस्थिति पैदा कर रहे हैं, जिसमें नींद अपने आप आ सके। गरीब देशों में तुम्हें इतने लोग अनिद्रा से पीड़ित नहीं मिलेंगे।

यह बात तो सदियों से सबको पता है कि भिखारियों को सम्राटों से बेहतर नींद आती है। शरीर का काम करने वाले बुद्धिजीवियों से ज्यादा अच्छी तरह सो लेते हैं। गरीबों की नींद अमीरों से ज्यादा गहरी होती है क्योंकि उन्हें अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए कड़ी मेहनत करना पड़ती है, और इस कड़ी मेहनत के साथ ही साथ वे अपनी नींद का अधिकार भी कमा लेते हैं।

वास्तव में क्या होता है : सारा दिन तुम आराम करते हो, फिर रात बिस्तर में करवटें बदलते हो। इतना ही व्यायाम तुम्हारे लिए बाकी बचा है। और वह भी तुम करना नहीं चाहते। जितनी करवटें बदल सकते हो, बदलो। अगर पूरा दिन तुमने आराम किया है तो रात को नींद नहीं आ सकती। तुम्हारा शरीर पहले ही आराम ले चुका है।

जो लोग अनिद्रा के शिकार हैं, वे यदि सच ही उससे छुटकारा पाना चाहते हैं, तो उन्हें इसे बीमारी नहीं मानना चाहिए। डॉक्टर के पास जाने से कुछ भी न होगा। उन्हें चाहिए कि वे अपने बगीचे में काम करें, कुछ मेहनत करें और नींद लाने की कोशिश न करें- वह अपने आप आती है। नींद तुम ला नहीं सकते, वह अपने आप आती है।

कठिनाई यह है, प्रकृति ने तो यह कभी चाहा नहीं कि तुम लोग संसार की सारी संपत्ति इकट्ठी कर लो और बाकी लोग गरीब रहें। प्रकृति के इरादे तो यही थे कि हर व्यक्ति काम करे। प्रकृति ने कभी अमीर और गरीब की वर्ग व्यवस्था नहीं चाही थी।

यह संभव है कि लोगों के काम अलग-अलग ढंग के हों। यदि तुम पूरा दिन चित्र बनाते रहे हो तो उससे भी नींद आ जाएगी। या फिर नकली व्यायाम खोजो- जिम जाओ, दौड़ लगाओ। लेकिन ये बेकार के व्यायाम हैं- जब तुम लकड़ी काट सकते हो, जो किसी काम आएगी, तो फिर दौड़ क्यों लगाते हो? तुम्हारे बगीचे पर कोई और आदमी काम कर रहा है, और वह आराम की नींद सोता है। तुम उसे उसके काम के लिए पैसे देते हो और वह मजे से सोता है।

तुम दौड़ लगाने जाते हो, कोई तुम्हें उसके पैसे भी नहीं देता; और न तुम्हें आराम से नींद आती है। दौड़ भी तुम आखिर कितना लोगे? और जो व्यक्ति पूरी रात न सोया हो उसे सुबह दौड़ने का मन भी नहीं करेगा, क्योंकि रातभर तो वह जरा-सी नींद के लिए संघर्ष करता रहा है। पूरी रात करवटें बदल-बदलकर सुबह जरा-सी तो आँख लग पाती है- और उस समय उससे कहा जाता है कि वह दौड़ लगाए, जॉगिंग करे!

अनिद्रा की गिनती बीमारियों में नहीं करनी चाहिए। लोगों को बस इतना बोध दिलवा देना चाहिए कि तुम शरीर की स्वाभाविक जरूरतों को पूरा नहीं कर रहे हो। लोग तैर सकते हैं, टेनिस खेल सकते हैं, लेकिन ये सब चीजें आठ घंटे के कड़े श्रम की विकल्प नहीं हैं। मनुष्य बुनियादी रूप से शिकारी था- तब उसके पास मशीनगनें नहीं थीं, तीर-कमान थे- जानवरों के पीछे उसे दौड़ना पड़ता था। और यह पक्का नहीं होता था कि हर रोज उसे भोजन मिल जाएगा। पूरा दिन वह जानवरों के पीछे दौड़ता था और अकसर तो ऐसा होता था कि वह एक भी शिकार न पकड़ पाए, बुरी तरह थके हुए, खाली हाथ उसे घर लौट आना पड़ता था।

तुम्हारा शरीर अभी भी तुमसे उसी श्रम की माँग कर रहा है। यह तुम्हारा चुनाव है कि वह श्रम तुम किस प्रकार करना चाहते हो; फिर अनिद्रा अपने आप ही दूर हो जाएगी। उन पाँच करोड़ अनिद्रा-पीड़ितों को किसी सहानुभूति की जरूरत नहीं है। उनसे सीधे-सीधे कह दिया जाना चाहिए कि ‘तुम्हारा जीने का ढंग गलत है। इस ढंग को बदलो या फिर इस पीड़ा को झेलो।’ और यदि ये पाँच करोड़ लोग दिन में आठ घंटा काम करना शुरू कर देते हैं तो एक बड़ी क्रांति घट सकती है। उन्हें अपने भोजन, अपने कपड़े या अपने मकान के लिए काम करने की तो अब जरूरत नहीं है, लेकिन वे उन लोगों के लिए काम कर सकते हैं जिन्हें भोजन चाहिए, दवाइयाँ चाहिए, जरूरत की और चीजें चाहिए।

यदि पाँच करोड़ लोग आठ घंटा रोज गरीबों के लिए काम करने लगें तो समाज का पूरा वातावरण बदल जाएगा। वर्गों के बीच की जो लड़ाई है, जो संघर्ष है वह समाप्त हो जाएगा, क्योंकि फिर कोई वर्ग ही न रहेंगे।

और यह समस्या रोज बड़ी होती जाने वाली है, क्योंकि हर जगह मशीनें आदमी की जगह ले रही हैं। मशीनें ज्यादा कुशल, ज्यादा आज्ञाकारी हैं; मशीनों को कोई छुट्टी भी नहीं चाहिए।

मशीनें कॉफी-ब्रेक भी नहीं माँगतीं। और एक मशीन सौ लोगों का या हजार लोगों का काम कर सकती है। तो जल्दी ही संसार मुश्किल में पड़ने वाला है; आने वाले दिनों में अनिद्रा सबसे बड़ी समस्या होगी, क्योंकि जब सब काम मशीनें संभाल लेंगी तो आदमी खाली हो जाएगा। उसे काम न करने की तनख्वाह मिलेगी। तो मैं इसे कोई बीमारी नहीं गिनता, इसे किसी बीमारी में मत गिनो।

जगह-जगह ऐसे लोगों के लिए विशेष ध्यान केंद्र होने चाहिए, जो अनिद्रा से पीड़ित हैं। ध्यान उन्हें शिथिल होने में सहयोगी होगा। और जब वे ध्यान करें तो उन्हें यह बता दिया जाना चाहिए कि केवल ध्यान से काम नहीं चलेगा, वह उपचार का केवल आधा हिस्सा है। तुम्हें शारीरिक श्रम भी करना पड़ेगा। और मेरा मानना है कि जो लोग अनिद्रा से पीड़ित हैं, वे कुछ भी करने को तैयार होंगे।

और कड़े श्रम की अपनी खूबसूरती है। लकड़ी काटते हुए तुम पसीना-पसीना हो जाओ और अचानक ठंडी हवा तुम्हारे शरीर से टकराए… शरीर में ऐसी प्यारी अनुभूति होगी कि जो व्यक्ति परिश्रम नहीं करता वह उसे समझ भी नहीं सकता। गरीब आदमी के भी अपने ऐश्वर्य हैं। केवल वही उनके बारे में जानता है। ”

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– दी पाथ ऑफ दी मिस्टिक
सौजन्य ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

सम्यक निद्रा के लिए ध्यान

मनुष्य-जाति की सभ्यता के विकास में सबसे ज्यादा जिस चीज को हानि पहुंची है वह निद्रा है। जिस दिन से आदमी ने प्रकाश की ईजाद की उसी दिन निद्रा के साथ उपद्रव शुरू हो गया। और फिर जैसे-जैसे आदमी के हाथ में साधन आते गए उसे ऐसा लगने लगा कि निद्रा एक अनावश्यक बात है। समय खराब होता है जितनी देर हम नींद में रहते हैं। समय फिजूल गया। तो जितनी कम नींद से चल जाए उतना अच्छा। क्योंकि नींद का भी कोई जीवन की गहरी प्रक्रियाओं में दान है, कंट्रीब्यूशन है यह तो खयाल में नहीं आता। नींद का समय तो व्यर्थ गया समय है। तो जितने कम सो लें उतना अच्छा। जितने जल्दी यह नींद से निपटारा हो जाए उतना अच्छा।.

एक तरफ तो इस तरह के लोग थे जिन्होंने नींद को कम करने की दिशा शुरू की। और दूसरी तरफ साधु-संन्यासी थे, उनको ऐसा लगा कि नींद जो है, मूर्च्छा जो है, यह शायद आत्म-ज्ञान की या आत्म-अवस्था की उलटी अवस्था है निद्रा। तो निद्रा लेना ठीक नहीं है। तो जितनी कम नींद ली जाए उतना ही अच्छा है। और भी साधुओं को एक कठिनाई थी कि उन्होंने चित्त में बहुत से सप्रेशंस इकट्ठे कर लिए, बहुत से दमन इकट्ठे कर लिए। नींद में उनके दमन उठ कर दिखाई पड़ने लगे, सपनों में आने लगे। तो नींद से एक भय पैदा हो गया। क्योंकि नींद में वे सारी बातें आने लगीं जिनको दिन में उन्होंने अपने से दूर रखा है। जिन स्त्रियों को छोड़ कर वे जंगल में भाग आए हैं, नींद में वे स्त्रियां मौजूद होने लगीं, वे सपनों में दिखाई पड़ने लगीं। जिस धन को, जिस यश को छोड़ कर वे चले आए हैं, सपने में उनका पीछा करने लगा। तो उन्हें ऐसा लगा कि नींद तो बड़ी खतरनाक है। हमारे बस के बाहर है। तो जितनी कम नींद हो उतना अच्छा। तो साधुओं ने सारी दुनिया में एक हवा पैदा की कि नींद कुछ गैर-आध्यात्मिक, अन-स्प्रिचुअल बात है।

यह अत्यंत मूढ़तापूर्ण बात है। एक तरफ वे लोग थे जिन्होंने नींद का विरोध किया, क्योंकि ऐसा लगा फिजूल है नींद, इतना सोने की क्या जरूरत है, जितने देर हम जागेंगे उतना ही ठीक है। क्योंकि गणित और हिसाब लगाने वाले, स्टैटिक्स जोड़ने वाले लोग बड़े अदभुत हैं। उन्होंने हिसाब लगा लिया कि एक आदमी आठ घंटे सोता है, तो समझो कि दिन का तिहाई हिस्सा तो सोने में चला गया। और एक आदमी अगर साठ साल जीता है, तो बीस साल तो फिजूल गए। बीस साल बिलकुल बेकार चले गए। साठ साल की उम्र चालीस ही साल की रह गई। फिर उन्होंने और हिसाब लगा लिए–उन्होंने हिसाब लगा लिया कि एक आदमी कितनी देर में खाना खाता है, कितनी देर में कपड़े पहनता है, कितनी देर में दाढ़ी बनाता है, कितनी देर में स्नान करता है–सब हिसाब लगा कर उन्होंने बताया कि यह तो सब जिंदगी बेकार चली जाती है। आखिर में उतना समय कम करते चले गए, तो पता चला, कि दिखाई पड़ता है कि आदमी साठ साल जीआ–बीस साल नींद में चले गए, कुछ साल भोजन में चले गए, कुछ साल स्नान करने में चले गए, कुछ खाना खाने में चले गए, कुछ अखबार पढ़ने में चले गए। सब बेकार चला गया। जिंदगी में कुछ बचता नहीं। तो उन्होंने एक घबड़ाहट पैदा कर दी कि जितनी जिंदगी बचानी हो उतना इनमें कटौती करो। तो नींद सबसे ज्यादा समय ले लेती है आदमी का। तो इसमें कटौती कर दो। एक उन्होंने कटौती करवाई। और सारी दुनिया में एक नींद-विरोधी हवा फैला दी। दूसरी तरफ साधु-संन्यासियों ने नींद को अन-स्प्रिचुअल कह दिया कि नींद गैर-आध्यात्मिक है। तो कम से कम सोओ। वही उतना ज्यादा साधु है जो जितना कम सोता है। बिलकुल न सोए तो परम साधु है।

ये दो बातों ने नींद की हत्या की। और नींद की हत्या के साथ ही मनुष्य के जीवन के सारे गहरे केंद्र हिल गए, अव्यवस्थित हो गए, अपरूटेड हो गए। हमें पता ही नहीं चला कि मनुष्य के जीवन में जो इतना अस्वास्थ्य आया, इतना असंतुलन आया, उसके पीछे निद्रा की कमी काम कर गई। जो आदमी ठीक से नहीं सो पाता, वह आदमी ठीक से जी ही नहीं सकता। निद्रा फिजूल नहीं है। आठ घंटे व्यर्थ नहीं जा रहे हैं। बल्कि आठ घंटे आप सोते हैं इसीलिए आप सोलह घंटे जाग पाते हैं, नहीं तो आप सोलह घंटे जाग नहीं सकते। वह आठ घंटों में जीवन-ऊर्जा इकट्ठी होती है, प्राण पुनरुज्जीवित होते हैं। और आपके मस्तिष्क के और हृदय के केंद्र शांत हो जाते हैं और नाभि के केंद्र से जीवन चलता है आठ घंटे तक। निद्रा में आप वापस प्रकृति के और परमात्मा के साथ एक हो गए होते हैं, इसलिए पुनरुज्जीवित होते हैं। अगर किसी आदमी को सताना हो, टॉर्चर करना हो, तो उसे नींद से रोकना सबसे बढ़िया तरकीब है। हजारों साल में ईजाद की गई। उससे आगे नहीं बढ़ा जा सका अब तक।

नींद वापस लौटानी जरूरी है। और अगर सौ, दो सौ वर्षों के लिए इस सारी दुनिया में कोई कानूनी व्यवस्था की जा सके कि आदमी को मजबूरी में सो ही जाना पड़े, कोई और उपाय न रहे, तो मनुष्य-जाति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए इससे बड़ा कोई कदम नहीं उठाया जा सकता। साधक के लिए तो बहुत ध्यान देना जरूरी है कि वह ठीक से सोए और काफी सोए। और यह भी समझ लेना जरूरी है कि सम्यक निद्रा हर आदमी के लिए अलग होगी। सभी आदमियों के लिए बराबर नहीं होगी। क्योंकि हर आदमी के शरीर की जरूरत अलग है, उम्र की जरूरत अलग है, और कई दूसरे तत्व हैं जिनकी जरूरत अलग है।




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