जब बाहर की सारी दौड़ व्यर्थ हो जाती है, तो अंतस में जाने का प्रश्न और विचार और जिज्ञासा खड़ी होती है।




🎆🎆साक्षी की साधना-ओशो(प्रवचन-12)🎆🎆
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(ओशो को भोगवादी कहने वालों को इस पोस्ट से उचित समाधान मिलेगा )

पूछा है: सत्य के खोजने की आवश्यकता ही क्या है? साधना की जरूरत क्या है? ध्यान को करने से क्या प्रयोजन?जो-जो हमारी वासनाएं हैं, इच्छाएं हैं, उनको पूरा करें, वही जीवन है, सत्य को खोजने इत्यादि की क्या आवश्यकता है?

Osho::–बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। पहले दिन मैंने यह कहा: सामान्यतया हमारा मन सुख चाहता है, लेकिन जो भी हम उपलब्ध करते हैं उससे सुख मिलता नहीं। सामान्यतया हमारा मन पद चाहता है, लेकिन जिस पद पर भी हम पहुंच जाएं, चाह का अंत नहीं आता, चाह आगे बढ़ जाती है। सामान्यतया हमारा मन जो भी चाहता है वह मिल जाए, तो भी चाह समाप्त नहीं होती, चाह आगे बढ़ जाती है।

सत्य को खोजने की कोई जरूरत नहीं है। यदि चाहें पूरी हो जातीं, तो सत्य को कोई भी नहीं खोजता। अगर संतुष्टि मिल जाती, सुख मिल जाता, सत्य को कोई भी नहीं खोजता। लेकिन जो हमारी सहज चाह है वह कितनी ही पूरी हो, तो भी जीवन को अर्थ और संतोष नहीं मिलता। इसी पीड़ा, इसी दर्द, इसी परेशानी से ऊब कर मनुष्य संतुष्टि से हटता है और सत्य की खोज में लगता है। किसी के कहने से कोई सत्य की खोज में नहीं लगता, उसके जीवन का अनुभव ही उसे उस तरफ ले जाता है।

और हम विचार करेंगे तो हैरान होंगे, हमारा मन सहज रूप से इसमें सहयोगी है, सत्य की खोज में हमारा मन सहज रूप से सहयोगी है। सामान्यतया आपने सुना होगा, मन बड़ा चंचल है, और मन की चंचलता को बहुत गालियां भी दी जाती हैं, बहुत बुरा भी कहा जाता है। मैं नहीं कहता हूं, मैं मन की चंचलता को बहुत बुरा नहीं कहता। क्योंकि मन अगर चंचल न हो, तो सत्य की खोज संभव ही नहीं होगी। अगर मन चंचल न हो, तो जिस चीज में भी इच्छा लगेगी मन वहीं अटका रह जाएगा। लेकिन मन कहीं भी नहीं अटकता, सब चीजों को व्यर्थ कर देता है और फिर आगे मांगने लगता है कि और आगे ले चलो। मन कहीं टिकता नहीं; नहीं तो आपने न मालूम किस गंदगी के ढेर पर उसे लगाया दिया होता और मन वहीं टिक जाता अगर वह चंचल न होता।

आपने धन में लगाया होता, मन धन में ही टिक जाता। फिर वह धन से कभी हटता ही नहीं। लेकिन आप कितने ही धन में लगाएं, मन और ज्यादा धन की मांग करने लगता है। उतना धन मिल जाए, तो और ज्यादा की मांग करने लगता है। मन की मांग और ज्यादा के लिए है। और और ज्यादा का कोई अंत नहीं आता। आप कितने ही पा जाएं, तो और ज्यादा चाहिए।

मन कहीं रुकता नहीं आपको और आगे बढ़ाता है। एक सीमा आती है मन की इस दौड़ की कि आप घबड़ा कर सजग, जाग जाते हैं कि यह क्या है? यह और ज्यादा की दौड़ क्या है? यह कहां अंत होगी??

रास्ते कहीं नहीं पहुंचाते, इससे घबड़ा कर सत्य की खोज शुरू होती है। यह किसी के सीखने सिखाने की बात नहीं है। जब आपको यह दिखाई पड़ता है कि कोई रास्ता कहीं नहीं पहुंचाता, जब सब रास्ते व्यर्थ हो जाते हैं, तो फिर एक ही रास्ता और खुला रह जाता है जो भीतर जाता है। सब रास्तों से ऊबा और असंतुष्ट हो गया व्यक्ति एक रास्ते में और खोजता है जो भीतर जाता है, शायद वहां कुछ मिल जाए।

भीतर की खोज सत्य की खोज है, बाहर की खोज संतुष्टि की खोज है। और यह जो चंचल मन है, यह सहयोगी है, यह कहीं रुकने नहीं देता, यह कहीं ठहरने नहीं देता।

मैंने कहना शुरू किया है, मन की चंचलता तभी समाप्त होती है जब हम वहां पहुंच जाते हैं जहां पहुंचने में जीवन का अर्थ उपलब्ध होता है, उसके पहले मन की चंचलता नष्ट नहीं होती। उसके पहले जिसकी मन की चंचलता नष्ट हो गई, वह जड़ हो जाएगा, उसके जीवन में गति विलीन हो जाएगी।

मन कहीं नहीं बैठता, सिवाय परमात्मा के। कहीं भी बिठाओ, वह नहीं बैठेगा। सत्य के सिवाय मन और कहीं नहीं बैठेगा, उसके पहले उसका चलना चलता ही रहेगा, वह चंचल बना रहेगा, यहां से वहां डोलेगा, वहां से यहां डोलेगा।

मन वहीं बैठता है जहां परम तृप्ति का बिंदु आ जाता है। और उस परम तृप्ति के बिंदु को ही मैं सत्य कह रहा हूं। हां, मैं कहूं इसलिए कोई सत्य की खोज नहीं करता, न कोई और आपसे कहे तो सत्य की खोज होती है। सत्य की खोज की तरफ आप निरंतर अपनी ही वासनाओं के कारण पहुंचते हैं। आपकी ही इच्छाएं, वासनाएं, आपके ही फ्रस्ट्रेशंस, आपकी ही अतृप्तियां, असंतोष, आपकी ही असफलताएं, वासना के जगत में कोई रास्ता कहीं नहीं पहुंचाता यह अनुभव, आपको निर्वासना के जगत में ले जाना शुरू कर देता है।

बाहर की सारी दौड़ व्यर्थ हो जाती है, तो अंतस में जाने का प्रश्न और विचार और जिज्ञासा खड़ी होती है। कोई दूसरा आपको यह नहीं सिखा सकता। कितना ही कोई शास्त्र पढ़ाए, कितना ही कोई समझाए, कितने ही उपदेश करे, नहीं समझा सकता।

इसलिए मैंने कहा: सत्य की खोज के लिए खुली हुई आंखें होनी चाहिए। खुली हुई आंखों से मतलब है: जीवन के अनुभव को देखने की क्षमता होनी चाहिए। चारों तरफ यदि हम देखेंगे, तो वह अनुभव अपने जीवन में देखेंगे, तो वह अनुभव, सारे अनुभव इकट्ठे होकर मनुष्य को सत्य की खोज में अग्रसर करते हैं।

फिर आप पूछते हैं: हम सत्य को क्यों खोजें?

मैं नहीं कहता कि आप खोजें। मैं नहीं कहता कि आप खोजें। लेकिन फिर आप क्या खोजेंगे? आप कहते हैं हम सत्य को क्यों खोजें? मैं नहीं कहता आप खोजें। लेकिन फिर आप क्या खोजेंगे? संतुष्टि खोजेंगे; संतुष्टि को खोज-खोज कर पाएंगे कि नहीं मिलती, फिर क्या करेंगे? फिर सत्य को खोजेंगे..!!

संतुष्टि जहां असफल हो जाती है वहीं सत्य की खोज शुरू हो जाती है। सुख की खोज जहां असफल हो जाती है, पूर्णतया असफल हो जाती है, वहीं सत्य की खोज शुरू हो जाती है। इसमें कोई किसी के सिखाने की बात नहीं। मैं किसी से नहीं कहता कि सत्य खोजें। मैं तो यही कहता हूं कि जो आपको ठीक लगे, उसी को खोजें। लेकिन आंखें खुली रखें, अंधे होकर न खोजें। जो आपको ठीक लगे–वासना ठीक लगे, वासना खोजें; सुख ठीक लगे, सुख खोजें,लेकिन आंख खुली रखें। अगर आंख खुली रही, तो बहुत दिन तक सुख नहीं खोज सकते हैं।

मैं आपसे कहता हूं, विवेक हो, तो बहुत दिन संतुष्टि की खोज नहीं कर सकते। सत्य की खोज अनिवार्य है। तो मैं नहीं कहता कि सत्य की खोज करें। मैं तो इतना ही कहता हूं, विवेक जाग्रत हो, होश जाग्रत हो। फिर जो आपको करना है करें। जहां जाना है जाएं। जो आपका मन हो करें। कोई अंतर नहीं पड़ता कि आप कहां जाते हैं?मैं आपसे नहीं कहता कि मंदिर जाएं, मैं नहीं कहता कि कोई सत्य की खोज मैं कोई विशेष काम करें। मैं इतना ही कहता हूं, होश जाग्रत रखें।

होश जाग्रत होगा, तो आज नहीं कल, आपकी जो संतोष की, सुख की, वासना की खोज है वह व्यर्थ हो जाएगी और उसकी जगह स्थापित हो जाएगी सत्य की खोज। वह आपके अनुभव से स्थापित होती है किसी की शिक्षा और उपदेश से नहीं।

ओशो




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