जिंदगी रोज नए सवाल लाती है और हमारे पास बंधे हुए रेडीमेड उत्तर हैं




॥ रेडिमेड कपड़े हो सकते है, उत्तर नहीं ॥

मैंने सुना है, जापान में एक छोटा-सा गांव था। उस गांव में दो मंदिर थे। एक मंदिर उत्तर का मंदिर था, एक दक्षिण का मंदिर था। उन दोनों मंदिरों में पुश्तैनी झगड़ा था, दुश्मनी थी।

मंदिरों में हमेशा झगड़ा होता है, यह तो आप जानते हैं। दो मंदिरों में दोस्ती नहीं सुनी होगी। मंदिरों में कभी दोस्ती नहीं होती। अभी वे अच्छे दिन नहीं आए दुनिया में जब मंदिरों में दोस्ती होगी। अभी मंदिरों में झगड़ा होता है। अभी मंदिर खतरनाक हैं। अभी मंदिर धार्मिक नहीं हैं। जब तक मंदिर झगड़ा करवाते हैं तब तक वे धार्मिक कैसे हो सकते हैं? अभी दुनिया में सभी मंदिर अधर्म के अड्डे हैं, क्योंकि उनसे झगड़े की शुरुआत होती है।

उस गांव के दोनों मंदिरों में भी झगड़ा था। झगड़ा इतना ज्यादा था कि पुजारी एक-दूसरे का चेहरा भी देखना पसंद नहीं करते थे। दोनों पुजारियों के पास दो छोटे बच्चे थे काम के लिए–सब्जी लाने के लिए, ऊपर का काम, सेवा करने के लिए। पुजारियों ने उन बच्चों को समझा दिया था कि कभी भूल कर दूसरे मंदिर की तरफ मत जाना और यह भी समझा दिया था कि दूसरे मंदिर का वह जो लड़का है उससे कोई दोस्ती मत करना। हमारी दुश्मनी बहुत प्राचीन है और प्राचीन चीजें बड़ी पवित्र होती हैं। तो इस पवित्र दुश्मनी को बाधा मत देना; कभी मिलना-जुलना मत।

लेकिन बच्चे बच्चे हैं। बूढ़े बिगाड़ने की कोशिश भी करते हैं तो भी एकदम से बिगाड़ तो नहीं देते। बच्चों को भी बिगड़ने में वक्त लग जाता है। बूढ़े तो बिगाड़ने की कोशिश करते हैं कि जन्म से ही बिगाड़ दें, लेकिन बिगाड़ते-बिगाड़ते वक्त लग जाता है। बच्चे थोड़े दिन तक नहीं बिगड़ते हैं, इनकार करते हैं। जिन बच्चों में जितनी जान होती है वे अपने मां-बाप से उतने लड़ते हैं कि बिगाड़ नहीं सकोगे हमें। लेकिन अक्सर मां-बाप जीत जाते हैं और बच्चे हार जाते हैं। अब तक तो ऐसा ही हुआ है, बच्चे अब तक नहीं जीत सके हैं। लेकिन आगे आशा बांधनी चाहिए कि वह वक्त आएगा कि मां-बाप हारेंगे और बच्चे जीतेंगे; क्योंकि जब तक बच्चे नहीं जीतते हैं मां-बाप से, तब तक दुनिया के पुराने रोग समाप्त नहीं हो सकते। वे जारी रहेंगे। क्योंकि मां-बाप उस जहर को बच्चों में डाल देते हैं।

वे बूढ़े पुजारी भी उन बच्चों को समझाते थे कि कभी भूल कर देखना भी मत! लेकिन बच्चे बच्चे हैं, कभी-कभी मौके-बेमौके चोरी से छिप कर वे आपस में मिल लेते थे। चोरी से मिलना पड़ता था। दुनिया इतनी बुरी है कि यहां अच्छे काम भी चोरी से करने पड़ते हैं; अभी अच्छे काम खुलेआम करने की नौबत नहीं आ पाई है। बच्चों को चोरी से मिलना पड़ता था। लेकिन एक दिन एक पुजारी ने देख लिया कि उसका बच्चा दूसरे बच्चे से रास्ते पर मिल रहा है। उस पुजारी को आग लग गई।

हिंदू बाप को आग लग जाती है, मुसलमान बेटे से उसका बेटा मिल रहा हो। और बेटे से बेटा मिल रहा हो तब तो आग कम लगती है, अगर बेटी से बेटा मिल रहा हो तब आग बहुत लग जाती है। क्योंकि दो बेटों का मिलना उतना खतरनाक नहीं है, लेकिन एक बेटे और बेटी का मिलना बहुत खतरनाक हो सकता है। वह खतरनाक इतना हो सकता है कि हिंदू और मुसलमान दोनों उस खतरे में बह जाएं। इसलिए बेटी और बेटे को मिलने की बिलकुल ही रुकावट है।

पुजारी ने देखा, वह क्रोध से भर गया और उस लड़के को बुलाया और कहा, तू उससे क्या बात कर रहा था? मैंने कितनी बार कहा कि उससे बात नहीं करनी है!

उस लडके ने कहा, आज तो मुझे भी लगा कि आप ठीक कहते हैं कि उससे बात नहीं करनी है, क्योंकि आज मैं पराजित होकर लौटा हूं। मैंने उस लड़के से पूछा कि कहां जा रहे हो? उस लड़के ने कहा, जहां हवाएं ले जाएं। और मैं एकदम हैरान रह गया। उसने ऐसी मेटाफिजिकल, इतनी दार्शनिक बात कह दी कि जहां हवाएं ले जाएं। फिर मुझे कुछ सूझा ही नहीं कि आगे मैं क्या कहूं।

उस पुजारी ने कहा, यह बहुत खतरनाक बात है! हम कभी उस मंदिर के किसी आदमी से नहीं हारे। यह हार पहली है, कल उस लड़के को हराना पड़ेगा। तू कल उससे जाकर पूछना फिर कि कहां जा रहे हो? और जब वह कहे जहां हवाएं ले जाएं, तो उससे कहना कि अगर हवाएं रुकी हों और न चल रही हों तो फिर कहीं जाओगे कि नहीं? फिर वह भी घबरा जाएगा।

वह लड़का उत्तर तैयार लेकर जाकर रास्ते पर खड़ा हो गया। उत्तर तैयार!

उत्तर तैयार बुद्धिहीनता का लक्षण है। जिस आदमी के पास भी उत्तर तैयार है उससे ज्यादा ईडियट, उससे ज्यादा जड़ बुद्धि का आदमी खोजना मुश्किल है। उत्तर तैयार होना ही मीडियॉकर माइंड का लक्षण है। बुद्धिमान आदमी के पास उत्तर कभी तैयार नहीं होते। वह प्रश्नों का साक्षात करता है और उत्तर जन्मते हैं, उत्तर तैयार नहीं होते।

पर उस लड़के ने उत्तर तैयार कर लिया और वह जाकर रास्ते पर खड़ा हो गया। अब वह तैयार अपना उत्तर रखे है कि कब वह आए और मैं पूछूं।

पंडित इसी तरह के होते हैं। सब उत्तर तैयार हैं।
वह लड़का आया रास्ते पर। तैयार उत्तर वाले लड़के ने पूछा कि मित्र, कहां जा रहे हो?

पूछने में उसे उत्सुकता नहीं थी, उसे उत्सुकता थी अपना उत्तर देने में। बहुत कम लोग हैं जिनकी उत्सुकता पूछने में होती है, बहुत अधिक लोग ऐसे ही हैं जिनको अपने उत्तर में उत्सुकता होती है। और जिन लोगों को उत्तर में उत्सुकता होती है, उनका पूछना सदा झूठा होता है।

उस लड़के ने कहा, कहां जा रहा हूं? जहां पैर ले जाएं!

अब बड़ी मुश्किल हो गई, क्योंकि उत्तर तैयार था! अब क्या करें, क्या न करें! वही उत्तर देना व्यर्थ हो गया है। क्रोध आया बहुत–अपने पर नहीं, इस लड़के पर कि बेईमान है! अपनी बात बदलता है! कल कहता था कि हवा जहां ले जाए, आज कहता है कि पैर जहां ले जाएं। बेईमान!

लेकिन लौट कर अपने गुरु से कहा कि वह लड़का तो बहुत बेईमान निकला। उस गुरु ने कहा कि उस मंदिर के लोग सदा से बेईमान रहे हैं। नहीं तो झगड़ा हमारा क्या है! क्या वह उत्तर बदल गया? कहा, वह तो बदल गया।

जो बुद्धिहीन हैं उन्हें कभी खयाल ही नहीं आता कि जिंदगी रोज बदल जाती है। जिंदगी बड़ी बेईमान है। सिर्फ मुर्दे नहीं बदलते, जिंदगी बदल जाती है। फूल बदल जाते हैं, पत्थर उनके नीचे वैसे ही पड़े रहते हैं। वे बिलकुल नहीं बदलते। पत्थर मन में सोचते होंगे कि बड़े बेईमान हैं ये फूल! सुबह खिलते हैं, दोपहर गिरने लगते हैं। क्या बेईमानी है! क्या बदलाहट मचा रखी है! सुबह कुछ, दोपहर कुछ, सांझ कुछ हो जाते हैं! हम पत्थरों को देखो, जैसे सुबह थे वैसे अब हैं। वैदिक युग से लेकर अब तक हम पत्थर ही हैं। ये फूलों का कोई भरोसा नहीं। इन फूलों का दिखता है कोई ठिकाना नहीं। इन फूलों के पास कोई आत्मा नहीं है। बस, बदल जाते हैं!

उस बच्चे ने कहा कि वह तो बदल गया, अब मैं क्या करूं? उसके गुरु ने कहा कि यह तो उसे हराना जरूरी है, मैं फिर तुझे उत्तर बताता हूं। तू तैयार करके अगली बार फिर जाना।

लेकिन फिर खयाल न आया कि तैयार उत्तर हार गया था। गुरु को खयाल आया कि वह उत्तर हार गया है। हार गया था तैयार उत्तर, लेकिन गुरु ने समझा कि वह खास उत्तर हार गया है। नासमझ यही समझते रहते हैं कि वह खास उत्तर हार गया तो दूसरा उत्तर काम आ जाएगा, लेकिन उन्हें पता नहीं कि तैयार उत्तर हमेशा हार जाते हैं। तैयार उत्तर हारता है; कोई उत्तर नहीं हारता।

दूसरे दिन उसने कहा कि जब वह पूछे कि जहां पैर ले जाएं तो उससे कहना कि भगवान न करे कि पैर से लंगड़े हो जाओ! अगर लंगड़े हो गए तो कहीं जाओगे कि नहीं?

वह लड़का खुश, फिर जाकर उसी रास्ते पर खड़ा हो गया। देख रहा है, प्रतीक्षा कर रहा है। वह लड़का उस मंदिर से निकला। उसने फिर उससे पूछा कि मित्र, कहां जा रहे हो?

उस लड़के ने कहा, साग-सब्जी लेने बाजार जा रहा हूं।

यह हमारा देश तैयार उत्तरों से पीड़ित है। यहां सब उत्तर तैयार हैं और कोई आदमी जिंदगी के किसी सवाल को सीधा एनकाउंटर, सीधा साक्षात करने के लिए तैयार नहीं है। वे चाहे उत्तर बुद्ध ने तैयार किए हों, चाहे महावीर ने, चाहे कृष्ण ने, चाहे अभी गांधी ने, वे उत्तर सब हमारे पास तैयार हैं और उन उत्तरों को पकड़ कर हम बैठे हैं। इस देश की आत्मा इसीलिए अविकसित रह गई है। इस देश की आत्मा इसीलिए पत्थर हो गई है कि उसने फूल होने का गुण खो दिया है। उसने परिवर्तन की क्षमता खो दी है। वह ठहर गई है, अटक गई है, स्टैटिक हो गई है। और अगर कोई कहे कि छोड़ दो तैयार उत्तरों को तो हम कहेंगे, हमारे महात्माओं को छीनते हो? हमारे गुरुओं को छीनते हो? हमारे तीर्थंकरों को छीनते हो? बड़े दुश्मन हो हमारे!

कोई आपके तीर्थंकर नहीं छीन रहा है; कोई आपके महात्मा नहीं छीन रहा है; लेकिन आप इतने जोर से पकड़े हुए हो कि आपको लगता है कि कहीं छिन न जाए।

पकड़ने की वजह से यह डर पैदा होता है कि कहीं छिन न जाए! पकड़ना छोड़ दो, कोई तीर्थंकर नहीं छिनेगा, कोई महात्मा नहीं छिनेगा। वे अपनी हैसियत से कुछ हैं, आपके पकड़ने की वजह से कुछ भी नहीं हैं। लेकिन हम जोर से पकड़े हुए हैं। हम उनको सहारा समझे हुए हैं।

वाद का मतलब होता है, तैयार उत्तर। जिंदगी रोज बदल जाती है, जिंदगी रोज नए सवाल पूछती है और वादी के पास तैयार उत्तर होते हैं। वह अपनी किताब में से उत्तर लेकर आ जाता है कि यह उत्तर काम करना चाहिए। जिंदगी रोज बदल जाती है, वादी बदलता नहीं, वादी ठहर जाता है।

जो महावीर पर ठहर गए हैं वे ढाई हजार वर्ष पहले ठहर गए हैं। ढाई हजार वर्ष में जिंदगी कहां से कहां चली गई और वादी महावीर पर ठहरा है। वह कहता है, हम महावीर को मानते हैं। जो कृष्ण पर ठहरा है वह साढ़े तीन, चार हजार वर्ष पहले ठहरा है। जो क्राइस्ट पर ठहरा है वह दो हजार साल पहले ठहरा है। वे वहां ठहर गए हैं जिंदगी वहां नहीं ठहरी है, जिंदगी आगे बढ़ती चली गई है।

जिंदगी प्रतिपल बदल जाती है। जिंदगी रोज नए सवाल लाती है और वादी के पास बंधे हुए रेडीमेड उत्तर हैं। रेडीमेड कपड़े हो सकते हैं, रेडीमेड उत्तर नहीं हो सकते। वह बंधे हुए उत्तर को लेकर नए सवालों के सामने खड़ा हो जाता है। वह कहता है कि हमारे उत्तर सही हैं। तब ये उत्तर हारते चले जाते हैं। इसलिए वादी व्यक्ति के पास निरंतर हार आती है, कभी जीत नहीं आती। वादी हमेशा हार जाते हैं।

एक एक कदम, प्रवचन-५, ओशो




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