तुरंत उत्तर न देना जीवन का परम सूत्र – गुर्जिएफ़




🔴तुरंत उत्तर न देना जीवन का परम सूत्र ।

गुरजिएफ एक फकीर हुआ, यूनान में। उसने अपनी आत्म-कथा में लिखा कि मेरा पिता मृत्यु-शय्या पर था, उसने मुझे अपने पास बुलाया, तब चौदह वर्ष की मेरी उम्र थी, मुझसे कान में उसने कहा: कि अगर मैं कोई सलाह दूं तो तुम बुरा नहीं मानोगे? बहुत समझदार आदमी रहा होगा वह, क्योंकि सलाह देने वाले यह कभी पूछते नहीं कि बुरा मानोगे कि नहीं मानोगे? सलाह देने वाले मुफ्त सलाह बांटते हैं। और दुनिया में जो चीज सबसे ज्यादा दी जाती है और सबसे कम ली जाती है, वह सलाह ही है। उस बूढ़े आदमी ने जिसकी नब्बे वर्ष उम्र थी, चौदह वर्ष के बच्चे से पूछा कि क्या मैं तुम्हें सलाह दूं तो तुम बुरा नहीं मानोगे? और अगर मैं तुम्हें सलाह दूं तो कभी तुम जीवन में मेरे प्रति रुष्ट तो नहीं रहोगे? उस युवक ने कहा कि आप कैसी बात करते हैं? आप कहें, आपको मुझे क्या कहना है? उस बूढ़े आदमी ने कहा: मेरे पास न तो संपत्ति है तुम्हें देने को, न मेरे पास और किसी तरह की यश और प्रतिष्ठा है, लेकिन जीवन भर अनुभव से मैंने एक बात पहचानी और जानी, वह मैं तुम्हें देना चाहता हूं। और वह यह है कि तुम खुद को खुद से जरा दूर रख कर देखना सीखना। अगर रास्ते पर तुम्हें कोई मिल जाए और तुम्हें गाली दे, तो जल्दी से उसकी गाली का उत्तर मत देना, घर लौट आना, दूर खड़े होकर देखना कि उसने जो गाली दी वह कहीं ठीक ही तो नहीं है? अगर वह ठीक हो, तो उसको जाकर धन्यवाद दे आना कि तुमने मुझ पर बड़ी कृपा की और एक बात मुझे बताई जिसका मुझे पता नहीं था। अगर वह ठीक न हो, तो उसकी चिंता छोड़ देना। क्योंकि जो बात ठीक नहीं है उससे तुम्हें प्रयोजन ही क्या?

गुरजिएफ ने लिखा है: फिर मैंने जीवन भर–उसी रात पिता उसका मर गया–इस बात की फिकर की, उसने लिखा है कि मेरे जीवन में फिर लड़ने का कोई मौका नहीं आया। गालियां तो मुझे लोगों ने बहुत बार दीं, लेकिन पहले मैंने उनसे कहा कि मित्र रुको, मैं जरा घर जाऊं, सोच-समझ कर आऊं, और फिर मैं आकर तुम्हें बताऊं। जब मैं घर गया और मैंने सोचा-समझा, तो मैंने पाया, कोई गाली इतनी बुरी नहीं हो सकती जितना बुरा मैं हूं। मैंने जाकर धन्यवाद दिया और कहा कि मित्र बहुत-बहुत धन्यवाद, और सदा स्मरण रखना, और जब भी जरूरत पड़े और तुम्हारे मन में कोई गाली आ जाए, तो छिपाना मत, मुझे दे देना।

जैसे-जैसे व्यक्ति का आत्म-निरीक्षण गहरा होगा, वह कुछ और ही दिशा में अपने विवेक को जगता हुआ पाएगा।

लेकिन आत्म-निरीक्षण है बिलकुल सोया हुआ हमारा। हम कभी देखते नहीं–हम क्या कर रहे हैं, क्या हो रहे हैं, क्या चल रहा है। अगर कोई हमको बताए भी, तो हम लड़ने को खड़े हो जाते हैं। स्मरण रखना, अगर किसी गाली पर आप लड़ने को खड़े हो गए, तो पक्का समझ लेना कि आप उस गाली के योग्य थे, नहीं तो आप लड़ने को तैयार नहीं होते। आप लड़ने को तैयार नहीं होते। आपको यह फिकर पड़ गई फौरन की मैं सिद्ध कर दूं कि यह गाली गलत है, इसीलिए कि आप बहुत भीतर जानते हैं कि यह गाली सही है। और अगर मैंने सिद्ध न किया कि गलत है, तो दुनिया को पता चल जाएगा। तो जब भी आप यह सिद्ध करने की कोशिश में लगे हैं कि फलां दोष मुझमें नहीं है, तो बहुत शांति से समझ लेना, वह दोष जरूर आपमें होगा। नहीं तो आप उसे गलत सिद्ध करने की फिकर न करते। कोई फिक्र आपमें पैदा न होती।

ओशो – साक्षी की साधना, प्रवचन – 6
♣️




Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*