ध्यान का अर्थ ही है, समय के बाहर निकल जाना




हेरिगेल एक जर्मन विचारक जापान में था तीन वर्षों तक। एक फकीर के पास एक अजीब-सी बात सीख रहा था। सीखने गया था ध्यान, और उस फकीर ने सीखना शुरू करवाया धनुर्विद्या का। हेरिगेल ने एक-दो दफे कहा भी कि मैं ध्यान सीखने जर्मनी से आया हूं और मुझे धनुर्विद्या से कोई प्रयोजन नहीं है। लेकिन उस फकीर ने कहा कि चुप! ज्यादा बातचीत नहीं। हम ध्यान ही सिखाते हैं। हम ध्यान ही सिखाते हैं।

दो-चार दिन, आठ दिन, हेरिगेल का पाश्चात्य मन सोचने लगा, भाग जाऊं। किस तरह के आदमी के चक्कर में पड़ गया! लेकिन एक आकर्षण रोकता भी था। उस आदमी की आंखों में कुछ कहता था कि वह कुछ जानता जरूर है। उसके उठने-बैठने में भनक मिलती थी कि वह कुछ जानता जरूर है। रात सोया भी पड़ा रहता और हेरिगेल उसे देखता, तो उसे लगता कि यह आदमी और लोगों जैसा नहीं सो रहा है। इसके सोने में भी कुछ भेद है! तो भाग भी न सके, और कभी पूछने की हिम्मत जुटाए, तो वह फकीर होंठ पर अंगुली रख देता कि पूछना नहीं। धनुर्विद्या सीखो।

एक साल बीत गया। सोचा हेरिगेल ने कि ठीक है; अब कोई उपाय नहीं है। इस आदमी से जाया भी नहीं जा सकता; इससे भागा भी नहीं जा सकता। नहीं तो यह फिर जिंदगीभर पीछा करेगा, इसका स्मरण रहेगा कि उस आदमी के पास था जरूर कुछ, कोई हीरा भीतर था, जिसकी आभा उसके शरीर से भी चमकती थी। मगर कैसा पागल आदमी है कि मैं ध्यान सीखने आया हूं, वह धनुर्विद्या सिखा रहा है! तो सोचा कि सीख ही लो, तो झंझट मिटे।

सालभर उसने अथक मेहनत की और वह कुशल धनुर्धर हो गया। उसके निशान सौ प्रतिशत ठीक लगने लगे। उसने एक दिन कहा कि अब तो मेरे निशान भी बिलकुल ठीक लगने लगे। अब मैं धनुर्विद्या भी सीख गया। अब वह ध्यान के संबंध में कुछ पूछ सकता हूं?

उसके गुरु ने कहा कि अभी धनुर्विद्या कहां सीखे? निशान ठीक लगने लगा, लेकिन असली बात नहीं आई। उसने कहा कि निशान ही तो असली बात है! अब मैं सौ प्रतिशत ठीक निशाना मारता हूं। एक भी चूक नहीं होती। अब और क्या सीखने को बचा? उसके गुरु ने कहा कि नहीं महाशय! निशाने से कुछ लेना-देना नहीं है। जब तक तुम तीर चलाते वक्त मौजूद रहते हो, तब तक मैं न मानूंगा कि तुम धनुर्विद्या सीख गए। ऐसे चलाओ तीर, जैसे कि तुम नहीं हो।

उसने कहा कि अब बहुत कठिन हो गया। अभी तो हम आशा रखते थे कि साल छः महीने में सीख जाएंगे, अब यह बहुत कठिन हो गया। यह कैसे हो सकता है कि मैं न रहूं! तो तीर चलाएगा कौन? और आप कहते हो कि तुम न रहो और तीर चले! एब्सर्ड है। तर्कयुक्त नहीं है। कोई भी गणित को थोड़ा समझने वाला, तर्क को थोड़ा समझने वाला कहेगा कि पागल के पास पहुंच गए। अभी भी भाग जाना चाहिए।

लेकिन सालभर उस आदमी के पास रहकर भागना निश्चित और मुश्किल हो गया, क्योंकि आठ दिन बाद ही भागना मुश्किल था। सालभर में तो उस आदमी की न मालूम कितनी प्रतिमाएं हेरिगेल के हृदय में अंकित हो गईं। सालभर में तो वह आदमी उसके प्राणों के पोर-पोर तक प्रवेश कर गया। भरोसा करना ही पड़ेगा, और आदमी बिलकुल पागल मालूम होता है।

उस फकीर ने कहा, तू जल्दी मत कर। जरूर वह वक्त आ जाएगा, जब तू मौजूद नहीं रहेगा और तीर चलेगा। और जिस दिन तू मौजूद नहीं है और तीर चलता है, उसी दिन ध्यान आ जाएगा। क्योंकि स्वयं को पूरी तरह अनुपस्थित कर लेने की कला ही ध्यान है, टु बी एब्सेंट टोटली।

और जिस क्षण कोई स्वयं को पूरी तरह अनुपस्थित कर लेता है, परमात्मा प्रवेश कर जाता है। परमात्मा के लिए भी जगह तो खाली करिएगा अपने घर के भीतर! आप इतने भरे हुए हैं कि परमात्मा आना भी चाहे, तो कहां से आए? उसको ठहरने लायक जगह भी भीतर चाहिए; उतनी जगह भी भीतर नहीं है! हम इतने ज्यादा अपने भीतर हैं, टू मच, कि वहां कोई रत्तीभर भी स्थान नहीं है, स्पेस नहीं है।

उस फकीर ने कहा, तू जल्दी मत कर। तू कुछ वक्त लगा और यह तीर निशान पर लगाने की बात न कर। निशान न भी लगा, तो चलेगा। उस तरफ निशान चूक जाए, चूक जाए; इस तरफ निशान न चूके। उसने कहा, इस तरफ के निशान का मतलब? कि इस तरफ करने वाला मौजूद न रहे, खाली हो जाए। तीर उठे और चले, और तू न रहे।

एक साल और उसने मेहनत की। पागलपन साफ मालूम होने लगा। रोज उठाता धनुष और रोज गुरु कहता कि नहीं; अभी वह बात नहीं आई। निशान ठीक लगते जाते, और वह बात न आती। एक साल बीत गया। भागना चाहा, लेकिन भागना और मुश्किल हो गया। वह आदमी और भरोसे के योग्य मालूम होने लगा। इन दो सालों में कभी उस आदमी की आंख में रंचमात्र चिंता न देखी। कभी उसे विचलित होते न देखा। सुख में, दुख में, सब स्थितियों में उस आदमी को समान पाया। वर्षा हो कि धूप, रात हो कि दिन, पाया कि वह आदमी कोई अडिग स्थान पर खड़ा है, जहां कोई कंपन नहीं आता।

भागना मुश्किल है। लेकिन बात पागलपन की हुई जाती है। दो साल खराब हो गए! गुरु से फिर एक दिन कहा कि दो साल बीत गए! उसके गुरु ने कहा कि समय का खयाल जब तक तू रखेगा, तब तक खुद को भूलना बहुत मुश्किल है। समय का जरा खयाल छोड़। समय बाधा है ध्यान में।

असल में समय क्या है? हमारा अधैर्य समय है। जो टाइम कांशसनेस है, वह समय का जो बोध है, वह अधैर्य के कारण है। इसलिए जो समाज जितना अधैर्यवान हो जाता है, उतना टाइम कांशस हो जाता है। जो समाज जितना धीरज से बहता है, उतना समय का बोध नहीं होता।

अभी पश्चिम बहुत टाइम कांशस हो गया है। एक-एक सेकेंड, एक-एक सेकेंड आदमी बचा रहा है; बिना यह जाने कि बचाकर करिएगा क्या? बचाकर करिएगा क्या? माना कि एक सेकेंड आपने बचा लिया और कार एक सौ बीस मील की रफ्तार से चलाई और जान जोखम में डाली और दो-चार सेकेंड आपने बचा लिए, फिर करिएगा क्या? फिर उन दो-चार सेकेंड से और कार दौड़ाइएगा! और करिएगा क्या?

लेकिन समय का बोध आता है भीतर के तनावग्रस्त चित्त से। इसलिए बड़े मजे की बात है कि आप जितने ज्यादा दुखी होंगे, समय उतना बड़ा मालूम पड़ेगा। घर में कोई मर रहा है और खाट के पास आप बैठे हैं, तब आपको पता चलेगा कि रात कितनी लंबी होती है। बारह घंटे की नहीं होती, बारह साल की हो जाती है। दुख का क्षण एकदम लंबा मालूम पड़ने लगता है, क्योंकि चित्त बहुत तनाव से भर जाता है। सुख का क्षण बिलकुल छोटा मालूम पड़ने लगता है। प्रियजन से मिले हैं और विदा का वक्त आ गया, और लगता है, अभी तो घड़ी भी नहीं बीती थी और जाने का समय आ गया! समय बहुत छोटा हो जाता है।

हेरिगेल का वह गुरु कहने लगा कि समय की बात बंद कर, नहीं तो ध्यान में कभी नहीं पहुंच पाएगा।

ध्यान का अर्थ ही है, समय के बाहर निकल जाना।

रुक गया। अब इस आदमी से भाग भी नहीं सकता। यही ट्रस्ट, श्रद्धा का मैं अर्थ कह रहा हूं आपसे। श्रद्धा का अर्थ है कि आदमी की बात भरोसे योग्य नहीं मालूम पड़ती, पर आदमी भरोसे योग्य मालूम पड़ता है। श्रद्धा का अर्थ है, बात भरोसे योग्य नहीं मालूम पड़ती, लेकिन आदमी भरोसे योग्य मालूम पड़ता है। बात तो ऐसी लगती है कि कुछ गड़बड़ है। लेकिन आदमी ऐसा लगता है कि इससे ठीक आदमी कहां मिलेगा! तब श्रद्धा पैदा होती है।

अब कृष्ण जो कह रहे हैं अर्जुन से, वह बात तो बिलकुल ऐसी लगती है कि जब कोई दुख विचलित न कर सकेगा, संसार से सब संसर्ग टूट जाएगा; पीड़ा-दुख, सबके पार उठ जाएगा मन। ऐसा मालूम तो नहीं पड़ता। जरा-सा कांटा चुभता है, तो भी संसर्ग टूटता नहीं मालूम पड़ता। इस विराट संसार से संसर्ग कैसे टूट जाएगा? कैसे इसके पार हो जाएंगे दुख के? दुख के पार होना असंभव मालूम पड़ता है। लेकिन कृष्ण आदमी भरोसे के मालूम पड़ते हैं। वे जो कह रहे हैं, जानकर ही कह रहे होंगे।

हेरिगेल और रुक गया, एक साल और। लेकिन तीन साल! उसके बच्चे, उसकी पत्नी वहां से पुकार करने लगे कि अब बहुत हो गया, तीन साल बहुत हो गए ध्यान के लिए! वह भी जर्मन पत्नी थी, तीन साल रुकी। हिंदुस्तानी होती, तो तीन दिन मुश्किल था। तीन साल बहुत वक्त होता है। वह चिल्लाने लगी कि अब आ जाओ। अब यह कब तक और! अभी वह लिखता जा रहा है कि अभी तो शुरुआत भी नहीं हुई। गुरु कहता है कि नाट ईवेन दि बिगनिंग, अभी तो शुरुआत भी नहीं हुई। और तू बुलाने के पीछे पड़ी है!

आखिर जाना पड़ा। तो उसने एक दिन गुरु को कहा कि अब मैं लौट जाता हूं, यह जानते हुए कि आप जो कहते हैं, ठीक ही कहते होंगे, क्योंकि आप इतने ठीक हैं। यह जानते हुए कि इन तीन वर्षों में बिना जाने भी मेरे भीतर क्रांति घटित हो गई है। और अभी आप कहते हैं कि दिस इज़ नाट ईवेन दि बिगनिंग, यह अभी शुरुआत भी नहीं है। और मैं तो इतने आनंद से भर गया हूं। अभी शुरुआत भी नहीं है, तो मैं सोचता हूं कि जब अंत होता होगा, तो किस परम आनंद को उपलब्ध होते होंगे! लेकिन दुखी हूं कि मैं आपको तृप्त न कर पाया; मैं असफल जा रहा हूं। मैं इस तरह तीर न चला पाया कि मैं न मौजूद रहूं और तीर चल जाए। तो मैं कल चला जाता हूं।

गुरु ने कहा कि तुम चले जाओ। जाने के पहले कल सुबह मुझसे मिलते जाना।

दोपहर उसका हवाई जहाज जाएगा, वह सुबह गुरु के पास पुनः गया। आज कोई उसे तीर चलाना नहीं है। वह अपनी प्रत्यंचा, अपने तीर, सब घर पर ही फेंक गया है। आज चलाना नहीं है; आज तो सिर्फ गुरु से विदा ले लेनी है। वह जाकर बैठ गया है।

गुरु किसी दूसरे शिष्य को तीर चलाना सिखा रहा है। बेंच पर वह बैठ गया है। गुरु ने तीर उठाया है, प्रत्यंचा पर चढ़ाया है, तीर चला। और हेरिगेल ने पहली दफा देखा कि गुरु मौजूद नहीं है, तीर चल रहा है। मौजूद नहीं है का मतलब यह नहीं कि वहां नहीं है, वहां है। लेकिन उसके हाव-भाव में कहीं भी कोई एफर्ट, कहीं कोई प्रयास, ऐसा नहीं लगता कि हाथ तीर को उठा रहे हैं, बल्कि ऐसा लगता है कि तीर हाथ को उठवा रहा है। ऐसा नहीं लगता कि प्रत्यंचा को हाथ खींच रहे हैं, बल्कि ऐसा लगता है, चूंकि प्रत्यंचा खिंच रही है, इसलिए हाथ खिंच रहे हैं। तीर चल गया, ऐसा नहीं लगता कि उसने किसी निशाने के लिए भेजा है, बल्कि ऐसा लगता है कि निशाने ने तीर को अपनी तरफ खींच लिया है।

उठा। दौड़कर गुरु के चरणों में गिर पड़ा। हाथ से प्रत्यंचा ले ली; तीर उठाया और चलाया। गुरु ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा कि आज! आज तू जीत गया। आज तूने इस तरह तीर चलाया कि तू मौजूद नहीं है। यही ध्यान का क्षण है।

हेरिगेल ने कहा, लेकिन आज तक यह क्यों न हो पाया? तो उसके गुरु ने कहा, क्योंकि तू जल्दी में था। आज तू कोई जल्दी में नहीं था। क्योंकि तू करना चाहता था। आज करने का कोई सवाल न था। क्योंकि अब तक तू चाहता था, सफल हो जाऊं। आज सफलता-असफलता की कोई बात न थी। तू बैठा हुआ था, जस्ट वेटिंग, सिर्फ प्रतीक्षा कर रहा था।

ओशो – गीता-दर्शन प्रवचन-58




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