जिन्हें भीतर का धन मिल गया, वे बाहर की दौड़ छोड़ देते हैं




बाहर का धन
भीतर की निर्धनता को
भुलाने की व्यवस्था, विधि है।
जितना गरीब आदमी होता है,
उतना ही धन के पीछे दौड़ता है।
इसलिए तो हमने देखा कि
कभी बुद्ध, कभी महावीर,
महाधनी लोग रहे होंगे,
कि सब छोड़ कर निकल पड़े
और भिखारी हो गए।
इस आश्चर्य की घटना को देखते हो
यहां निर्धन धन के पीछे दौड़ते रहते हैं,
यहां धनी निर्धन हो जाते हैं।
जिन्हें भीतर का धन मिल गया,
वे बाहर की दौड़ छोड़ देते हैं।

 




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