नवीनतम विज्ञान की खोजें कहती हैं, कि बच्चे की नाल को तत्क्षण काटना सदा के लिए उसे कमजोर बना देना है।




*पहली सांस जिसने घबड़ाहट से, भय से, कंपन से ली हो उसमें जीवनभर भय और कंपन प्रविष्ट हो जाएगा। अब तुम जीना चाहो तो भी तुम स्वतंत्र नहीं; हस्तक्षेप है।तुम मरना चाहो तो भी हस्तक्षेप है। मरने की स्वतंत्रता नहीं है।- ओशो*

जन्म के पहले क्षण से समाज का हस्तक्षेप शुरू हो जाता है तुम्हें मारने का।

  • वह बच्चा पैदा नहीं हुआ, कि समाज मौजूद है। जैसे ही बच्चा पैदा होता है, नवीनतम खोजें कहती हैं विज्ञान की कि *जैसे ही बच्चा पैदा होता है सारी दुनिया में दाइयां, डाक्टर, नर्सेस बच्चे की नाल को तत्क्षण काट देते हैं। और नवीनतम विज्ञान की खोजें कहती हैं, कि बच्चे की नाल को तत्क्षण काटना सदा के लिए उसे कमजोर बना देना है। सदा के लिए। वह कभी बलवान न हो सकेगा। और सदा उसकी ऊर्जा क्षीण प्रवाह की होगी।*

उसके पीछे कारण है। *मां के पेट में बच्चा श्वास खुद नहीं लेता। नाभि से जुड़े नाल से मां ही उसके लिए श्वास लेती है। मां की श्वास पर ही बच्चे का हृदय धड़कता है लेकिन बच्चा स्वयं श्वास नहीं लेता।* श्वास, आक्सीजन, वायु, प्राण नाभि से भीतर जाते हैं। वह बच्चे की व्यवस्था है मां के पेट में, कि वह मां का एक अंग है। मां का अंग होकर जीता है।

*जैसे ही बच्चा मां के पेट के बाहर आया, एकदम से श्वास नहीं ले सकता। क्योंकि नये यंत्र को चलने में थोड़ा वक्त लगेगा।*भीतर एक बड़ा रूपांतरण घटेगा। अभी तक नाभि से सांस ली थी, अब नाक से सांस लेगा। एक नई व्यवस्था शुरू होगी। इसमें कोई पांच मिनिट, सात मिनिट लगते हैं। लेकिन हम बच्चे की नाल तत्क्षण काट देते हैं।
जब कि बच्चा मां से अभी नाल के द्वारा सांस ले ही रहा था। पांच-सात मिनट में रूपांतरण हो जाएगा। बच्चा सांस लेने लगेगा, उसका हृदय धड़कने लगेगा,तब तुम नाल को काटना। क्योंकि अब बच्चा स्वयं अपनी ऊर्जा को पाने लगा। ज्यादा देर नहीं लगती, पांच-सात मिनट का ही मामला है, लेकिन धैर्य नहीं है समाज को।

बड़े से बड़े अस्पताल में, कुशल से कुशल डाक्टर के नीचे भी वही हो रहा है जो एक गैर-कुशल दाई गांव में कर रही है। बे-पढ़ी लिखी दाई गांव में कर रही है। उनके काटने के ढंग बदल गए हैं। दाई बेहूदे ढंग से काटती है, उसके पास उतने कुशल औजार नहीं। डाक्टर बड़ी कुशलता से काटता है। उसके पास सुविधा संपन्नता है। सारे कुशल औजार हैं। लेकिन दोनों एक ही काम कर रहे हैं।

*जैसे ही तुम नाल काट देते हो, सारे बच्चे का जीवनत्तंत्र घड़बड़ा जाता है, हड़बड़ा जाता है। और इसलिए बच्चा रो उठता है,चीखता है।*
क्योंकि एक नई सांस की व्यवस्था उसको लेनी पड़ती है। घबड़ाहट से सांस लेता है। और *पहली सांस जिसने घबड़ाहट से, भय से, कंपन से ली हो उसमें जीवनभर भय और कंपन प्रविष्ट हो जाएगा। क्योंकि श्वास जीवन है। भय पहली ही श्वास से जुड़ गया। अब पूरा जीवन यह भयभीत आदमी होगा।*

*पांच मिनिट रुका जा सकता है। पांच मिनिट के बाद अपने आप नाभि से जुड़ा हुआ नाल और उसका कंपन बंद हो जाता है। पांच मिनिट तक कंपन जारी रहता है। क्योंकि धड़कन जारी रहती है, श्वास जारी रहती है। पांच मिनट में नाल अपने आप बंद हो जाती है। प्रकृति के द्वारा ही उसका कंपन बंद हो जाता है।*

*उसकी गर्मी और ऊर्जा खो जाती है। यंत्र बदल गया। अब तुम काट सकते हो। अब तुम मुर्दा चीज को काट रहे हो। पांच मिनिट पहले तुम जिंदा चीज को काट रहे थे, और तुमने बच्चे को पहला धक्का दे दिया, और बच्चा बहुत कोमल है, अति कोमल है।*

नौ महीने मां के पेट में उसने कोई कष्ट नहीं जाना। कोई पीड़ा नहीं जानी। किसी तरह का दुख नहीं जाना। एकदम स्वर्ग से, आदमी के बगीचे से बाहर आ रहा है। और तुमने उसे पहला धक्का दे दिया। *मनोवैज्ञानिक कहते हैं, यह जो धक्का है, यह सारी दुनिया को कमजोर बनाए हुए है। डाक्टर को जल्दी है। शायद वह कहेगा, कि पच्चीस और बच्चे होनेवाले हैं। हड़बड़ाहट है, बेचैनी है, उसका खून मन तना हुआ है।*

और उसे पता नहीं, वह क्या कर रहा है। अब तो यह अचेतन का हिस्सा हो गया, कि बच्चा पैदा हुआ, नाल काट दी। *जन्म की पहली घड़ी से भय समाविष्ट हो गया। अब तुम्हें कोई भी डरा सकेगा।* अब तुम्हें कोई भी चीज डरा सकेगी। पुलिस का डंडा डरा सकेगा। पुरोहित की आवाज डरा सकेगी, कि नर्क चले जाओगे।

अब तुम्हें कोई भी प्रलोभित कर लेगा। क्योंकि प्रलोभन भय का ही दूसरा रूप है। और यह चलती है समाज की व्यवस्था अंतिम क्षण तक, आखिरी दम तक। *तुम जीना चाहो तो भी तुम स्वतंत्र नहीं; हस्तक्षेप है।तुम मरना चाहो तो भी हस्तक्षेप है। मरने की स्वतंत्रता नहीं है।*

ओशो; कहे कबीर दीवाना; प्रवचन-2

॥ बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया पर ओशो की अंतर्दृष्टी ॥ पर एक अन्य प्रवचनांश…👇

फ्रांस का एक मनोवैज्ञानिक मां के पेट से बच्चा पैदा होता है तो उसको एकदम से टब में रखता है–गरम पानी में, कुनकुने। और चकित हुआ है यह जान कर कि बच्चा इतना प्रफुल्लित होता है कि जिसका कोई हिसाब नहीं।

तुम यह जान कर हैरान होओगे कि इस मनोवैज्ञानिक ने–उस मनोवैज्ञानिक का सहयोगी मेरा संन्यासी है, उस मनोवैज्ञानिक की बेटी मेरी संन्यासिनी है–पहली बार मनुष्य जाति के इतिहास में बच्चे पैदा किए हैं, जो रोते नहीं पैदा होते से, हंसते हैं। हजारों बच्चे पैदा करवाए हैं उसने। वह दाई का काम करता है। उसने बड़ी नई व्यवस्था की है।

पहला काम कि बच्चे को पैदा होते से ही वह यह करता है कि उसे मां के पेट पर लिटा देता है, उसकी नाल नहीं काटता। साधारणतः पहला काम हम करते हैं कि बच्चे की नाल काटते हैं। वह पहले नाल नहीं काटता, वह पहने बच्चे को मां के पेट पर सुला देता है। क्योंकि वह पेट से ही अभी आया है, इतने जल्दी अभी मत तोड़ो। बाहर से भी मां के पेट पर लिटा देता है और बच्चा रोता नहीं। मां के पेट से उसका ऐसा अंतरंग संबंध है; अभी भीतर से था, अब बाहर से हुआ, मगर अभी मां से जुड़ा है। और नाल एकदम से नहीं काटता। जब तक बच्चा सांस लेना शुरू नहीं कर देता, तब तक वह नाल नहीं काटता।

हमारी अब तक की आदत और व्यवस्था यह रही है कि तत्क्षण नाल काटो, फिर बच्चे को सांस लेनी पड़ती है। सांस उसे इतनी घबड़ाहट में लेनी पड़ती है, क्योंकि नाल से जब तक जुड़ा है, तब तक मां की सांस से जुड़ा है, उसे अलग से सांस लेनी की जरूरत भी नहीं है। और उसके पूरे नासापुट और नासापुट से फेफड़ों तक जुड़ी हुई नालियां सब कफ से भरी होती हैं, क्योंकि उसने सांस तो ली नहीं कभी! तो एकदम से उसकी नाल काट देना, उसे घबड़ा देना है। कुछ क्षण के लिए उसको इतनी बेचैनी में छोड़ देना है। उस बेचैनी में बच्चे रोते हैं, चिल्लाते हैं, चीखते हैं। और हम सोचते हैं वे इसलिए चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं कि यह सांस लेने की प्रक्रिया है, नहीं तो वे सांस कैसे लेंगे? और अगर नहीं चिल्लाता बच्चा, तो डाक्टर उसको उलटा लटकाता है कि किसी तरह चिल्ला दे। फिर भी नहीं चिल्लाता, तो उसे धौल जमाता है कि चिल्ला दे! चिल्लाना चाहिए ही बच्चे को। चिल्लाए-रोए, तो उसका कफ बह जाए, उसके नासापुट साफ हो जाएं, सांस आ जाए।

मगर यह जबर्दस्ती सांस लिवाना है। यह झूठ शुरू हो गया, शुरू से ही शुरू हो गया! यह प्रारंभ से ही गलती शुरू हो गई। पाखंड शुरू हुआ। सांस तक भी तुमने स्वाभाविक रूप से न लेने दी! सांस तक तुमने कृत्रिम करवा दी, जबर्दस्ती करवा दी। घबड़ा दिया बच्चे को।

यह खूब स्वागत किया! यह खूब सौगात दी! यह खूब सम्मान किया। उलटा लटकाया, धौल जमाई, रोना सिखाया; अब जिंदगी भर धौलें पड़ेंगी, उलटा लटकेगा, शीर्षासन करेगा। यह उलट-खोपड़ी हो ही गया! और जिंदगी भर रोएगा–कभी इस बहाने, कभी उस बहाने। इसकी जिंदगी में मुस्कुराहट मुश्किल हो जाएगी। झूठी होगी, थोपेगा। मगर भीतर आंसू भरे होंगे।

इस मनोवैज्ञानिक ने अलग ही प्रक्रिया खोजी। वह मां के पेट पर बच्चे को लिटा देता है। बच्चा धीरे-धीरे सांस लेना शुरू करता है। जब बच्चा धीरे-धीरे सांस लेने लगता है और मां के पेट की गर्मी उसे अहसास होती रहती है और मां को भी अच्छा लगता है, क्योंकि पेट एकदम खाली हो गया, बच्चा ऊपर लेट जाता है तो पेट फिर भरा मालूम होता है। वह एकदम रिक्त नहीं हो जाती।

फिर सब चीजें आहिस्ता। क्या जल्दी पड़ी है? नहीं तो जिंदगी भर फिर जल्दबाजी रहेगी, भाग-दौड़ रहेगी। जब बच्चा सांस लेने लगता है, तब वह नाल काटता है। फिर बच्चे को टब में लिटा देता है ताकि उसे अभी भी गर्भ का जो रस था वह भूल न जाए; गर्भ की जो भाषा थी वह भूल न जाए। टब में वह ठीक उतने ही रासायनिक द्रव्य मिलाता है, जितने मां के पेट में होते हैं। वे ठीक उतने ही होते हैं, जितने सागर में होते हैं। सागर का पानी और मां के पेट का पानी बिलकुल एक जैसा होता है।

इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने खोजा है कि मनुष्य का पहला जन्म सागर में ही हुआ होगा, मछली की तरह ही हुआ होगा। इसलिए हिंदुओं की यह धारणा कि परमात्मा का एक अवतार मछली का अवतार था, अर्थपूर्ण है। शायद वह पहला अवतार है–मत्स्य अवतार, मछली की तरह। धीरे-धीरे, धीरे-धीरे नरसिंह अवतार–आधा मनुष्य, आधा पशु। और शायद अभी भी आदमी आधा नर, आधा पशु ही है। अभी भी नरसिंह अवतार ही चल रहा है! अभी भी पूरा मनुष्य नहीं हो पाया। पूरा मनुष्य तो कोई बुद्ध होता है। सभी पूरे मनुष्य नहीं हो पाते।

तो उसे लिटा देता है मनोवैज्ञानिक अभी टब में। और चकित हुआ यह जान कर कि अभी-अभी पैदा हुआ बच्चा टब में लेट कर बड़ा प्रफुल्लित होता है, मुस्कुराता है। एकदम से रोशनी नहीं करता कमरे में। यह सारी प्रक्रिया जन्म की बड़ी धीमी रोशनी में होती है, मोमबत्ती की रोशनी में–कि बच्चे की आंखों को चोट न पहुंचे।

हमारे अस्पतालों में बड़े तेज बल्ब लगे होते हैं, टयूब लाईट लगे होते हैं। जरा सोचो तो, नौ महीने जो मां के पेट में अंधकार में रहा है, उसे एकदम टयूब लाइट…! चश्मे लगवा दोगे। आधी दुनिया चश्मे लगाई हुई है। छोटे-छोटे बच्चों को चश्मे लगाने पड़ रहे हैं। यह डाक्टरों की कृपा है! अंधे करवा दोगे न मालूम कितनों को! आंखों के तंतु अभी बच्चे के बहुत कोमल हैं। पहली बार आंख खोली है। जरा आहिस्ता से पहचान होने दो। क्रमशः पाठ सिखाओ।

मोमबत्ती का दूर धीमा-सा प्रकाश। फिर आहिस्ता-आहिस्ता प्रकाश को बढ़ाता है। धीरे-धीरे, ताकि बच्चे की आंखें राजी होती जाएं।

यह बच्चे को स्वाभाविक जन्म देने की प्रक्रिया है। इस बच्चे की जिंदगी कई अर्थों में और ढंग की होगी। यह कई बीमारियों से बच जाएगा। इसकी आंखें शायद सदा स्वस्थ रहेंगी और इसके जीवन में एक मुस्कुराहट होगी, जो स्वाभाविक होगी

ओशो
ज्यूं था त्यूं ठहराया, प्रवचन#२




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