प्राण और उसका स्वरूप




 

*मुख्य प्राण और उपप्राण का स्वरूप ?*

मुख्य प्राण :-

*१. प्राण*
:- इसका
स्थान नासिका से ह्रदय तक है . नेत्र , श्रोत्र , मुख आदि अवयव इसी के सहयोग से कार्य करते
है . यह सभी प्राणों का राजा है . जैसे राजा अपने अधिकारीयों को विभिन्न स्थानों पर
विभिन्न कार्यों के लिये नियुक्त करता है , वैसे ही यह भी अन्य
अपान आदि प्राणों को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न कार्यों के लिये नियुक्त करता है
.

*२. अपान :-* इसका स्थान नाभि से पाँव तक है , यह गुदा इन्द्रिय
द्वारा मल व वायु को उपस्थ ( मुत्रेन्द्रिय) द्वारा मूत्र व वीर्य को योनी द्वारा रज
व गर्भ का कार्य करता है .

*३. समान :-*इसका स्थान ह्रदय से नाभि तक बताया गया है
. यह खाए हुए अन्न को पचाने तथा पचे हुए अन्न से रस , रक्त आदि धातुओं को बनाने का कार्य करता
है .

*४. उदान :-*यह
कण्ठ से सिर ( मस्तिष्क ) तक के अवयवों
में रहेता है , शब्दों का उच्चारण , वमन ( उल्टी ) को निकालना आदि कार्यों के
अतिरिक्त यह अच्छे कर्म करने वाली जीवात्मा को अच्छे लोक ( उत्तम योनि ) में , बुरे कर्म करने वाली जीवात्मा को बुरे लोक
( अर्थात सूअर , कुत्ते आदि की योनि )
में तथा जिस आत्मा ने पाप – पुण्य बराबर किए हों ,
उसे मनुष्य लोक
( मानव योनि ) में ले जाता है ।

*५. व्यान :-*यह
सम्पूर्ण शरीर में रहेता है । ह्रदय से मुख्य १०१
नाड़ीयाँ निकलती है , प्रत्येक नाड़ी की १००-१०० शाखाएँ है तथा प्रत्येक शाखा की भी ७२००० उपशाखाएँ है । इस प्रकार कुल ७२७२१०२०१ नाड़ी
शाखा- उपशाखाओं में यह रहता
है । समस्त शरीर में रक्त-संचार , प्राण-संचार का कार्य यही करता है तथा अन्य प्राणों को उनके कार्यों में
सहयोग भी देता है ।

*उपप्राण :-*

*१. नाग :-*यह
कण्ठ से मुख तक रहता है । उदगार (डकार ) , हिचकी आदि कर्म इसी
के द्वारा होते है ।

*२. कूर्म :-*
इसका स्थान मुख्य रूप से नेत्र
गोलक है , यह नेत्रा गोलकों
में रहता हुआ उन्हे दाएँ -बाएँ , ऊपर-नीचे घुमाने की
तथा पलकों को खोलने बंद करने की किया करता
है । आँसू भी इसी के सहयोग से निकलते है ।

*३. कूकल :-* यह
मुख से ह्रदय तक के स्थान में रहता है तथा
जृम्भा ( जंभाई =उबासी ) , भूख , प्यास आदि को उत्पन्न करने का कार्य करता है ।

*४. देवदत्त :-*यह
नासिका से कण्ठ तक के स्थान में रहता है । इसका कार्य छिंक , आलस्य , तन्द्रा , निद्रा आदि को लाने का है ।

*५. धनज्जय :-*यह
सम्पूर्ण शरीर में व्यापक रहता है , इसका कार्य शरीर के अवयवों को खिचें रखना
, माँसपेशियों को सुंदर
बनाना आदि है । शरीर में से जीवात्मा के निकल जाने पर यह भी बाहर निकल जाता है , फलतः इस प्राण के
अभाव में शरीर फूल जाता है ।

जब शरीर विश्राम
करता है , ज्ञानेन्द्रियाँ , कर्मेन्द्रियाँ स्थिर हो जाती है , मन शांत हो जाता
है । तब प्राण और जीवात्मा जागता है । प्राण के संयोग से जीवन और प्राण के वियोग से
मृत्यु होती है ।

जीव का अंन्तिम साथी
*प्राण* है ।

 




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