प्रोफेशनल स्किल्स professional skills




  1. काम करने का तरीका और मीठी जुबान. इसी को आजकल प्रोफेशनल स्किल्स कहते हैं, हुनर कहते हैं.

एक आदमी है. पिछले 20 साल से देख रहा हूँ. ऑफिस से बाहर निकलते ही ‘अपना बाजार’ की बिल्डिंग है. उसके ठीक सामने वाशी से कोपरखैरणे जाने वाली सड़क है. अपना बाजार और सड़क के बीच की जगह हमेशा व्यस्त रहती है, लोग आते जाते रहते हैं. वहीं कई पेड़ हैं. किसी एक पेड़ की छाया में प्लास्टिक की एक कुर्सी डालकर यह हँसमुख इंसान , प्रेस की हुई सफेद शर्ट में, नित्य सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक बैठता है. मैं पिछले 20 साल से देख रहा हूँ, वही शख्स, वही छवि, वही ड्रेस, वही manners, वही एटीकेट्स, वही मुस्कान, वही लोगों को हेल्प करने की तत्परता, वही मोहब्बत, वही इंसानियत.

10 साल हो गए. एक बार मैंने व कोपरखैरणे वाले मिश्रा जी ने सोचा कि परिवारों को महाबलेश्वर घुमा दें. प्लान हुआ कि दो गाड़ी कर लेते हैं, एक 5 सीटर और दूसरी 7 सीटर. मैं अपना बाजार के सामने से निकल रहा था. कुर्सी पर बैठे सफेद शर्ट वाले उसी आदमी से पूछ लिया – असलम भाई, महाबलेश्वर जाना है, पिकनिक पर, गाड़ी चाहिए, कहाँ मिलेगी ?

असलम भाई बोले – ये लो सर, आप भी कमाल करते हो, यहीं मिलेगी, यही तो मेरा काम है, मैं टूर & ट्रैवेल एजेंट हूं, सब कुछ यहीं मिलेगा. हम कभी उनको देख रहे थे, कभी उनकी कुर्सी को. वे बोले – ये कुर्सी मेरा ऑफिस है, जब मैं इसमें बैठ जाता हूँ और मोबाइल हाथ में ले लेता हूँ, मेरा ऑफिस शुरू हो जाता है. इसी ऑफिस ने मेरा परिवार पाला है, बच्चों को पढ़ाया है, उन्हें काम लायक बनाया है.

दो चार जगह मोबाइल लगाए, भाव ताव किए, बोले घर जाइए, तैयारी कीजिए, 1 घंटे में गाड़ी घर पंहुच जाएगी. मैंने पूछा – आपके पैसे ? असलम भाई बोले – गाड़ी वाले को जब पैसे दीजिएगा तब 200 extra दे दीजिएगा. वही मेरा है. उससे जादा कुछ नही चाहिए. आप याद करते रहिए, बस यही चाहिए.

हम देखते रह गए. देखते रह गए बंदे के काम करने का प्रोफेशनल तरीका और मीठी जुबान. इसी को आजकल स्किल्स कहते हैं, हुनर कहते हैं.

आज फिर उनके सामने से गुजरना हुआ. जैसे ही करीब पहुंचा, वो कुर्सी से खड़े हो गए, नमस्कार किए, हाल चाल पूछा और बैठ गए. मैं आगे चल दिया. 10 कदम ही आगे बढ़ा था, पीछे मुड़ा, उनके पास गया, उनका फोटो लिया, सोचा कि अपने युवाओं को इस अच्छे इंसान से मिला दूं, इनके रहन सहन, बोल चाल, आचार व्यवहार के तौर तरीके से मिला दूं.उन्हें इस बात से मिला दूं कि कोई काम छोटा बड़ा नही होता, जो काम परिवार पाले, बच्चों को पाले, उन्हें इंसान बनाए, काम लायक बनाए, वो काम बड़ा होता है, भले ही उस काम की कुर्सी, बड़े ऑफिस में हो या फिर सड़क किनारे पेड़ की छाया में.

असलम भाई को सलाम 💐💐💐

Sabhar : Arun Mishra G ki wall se




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