मन भ्रामक है–जो होता तो नहीं है पर दिखता है




मन भ्रामक है–जो होता तो नहीं है पर दिखता है 😊

लोग मेरे पास आते हैं और पूछतें हैं, “एक शांत मन को कैसे पाया जाए?” मैं उनसे कहता हूँ, “शांत मन,एसा कुछ भी नहीं पाया जाता है, इसके बारे में कभी कुछ सुना ही नहीं।”

मन कभी शांत नहीं होता; अ-मन शांत होता है। मन अपने आप में कभी भी शांत, मौन नहीं होता। क्योंकि मन का स्वभाव ही है तनावग्रस्त होना, उलझन में पड़ रहना। जो कुछ भी तुम्हारे आस-पास घट रहा है उन सब की जड़े तुम्हारे मन में निहित है। मन ही सदा कारण होता है। वह एक प्रक्षेपण करने वाला यंत्र है, और बाहर केवल पर्दे ही पर्दे हैं–तुम उन पर्दों पर अपने आप को प्रक्षेपित कर लेते हो। यदि तुम्हे यह भद्दा प्रतीत होता है तो अपने मन को परिवर्तित कर लो। यदि तुम्हेप्रतीत होता है कि जो कुछ भी मन से आ रहा है वह नारकीय है और भयानक है, तो मन को गिरा दो। मन पर कार्य करना है, परदे पर नहीं; उस पर बार-बार चित्रकारी कर के उसे बदलते मत रहो। मन पर कार्य करो।

परंतु एक समस्या है, क्योंकि तुम सोचते हो कि तुम मन हो । तो तुम इसे गिरा कैसे सकते हो? तो तुम्हे लगता है कि तुम सब-कुछ गिरा सकते हो, सबकुछ बदल सकते हो, उसे फिर से रंग सकते हो, फिर से संवारसकते हो, पुनर्व्यवस्थित कर सकते हो, किन्तु तुम खुद को कैसे गिरा सकते हो? यही सारे उपद्रव की जड़ है।

तुम मन नहीं हो, तुम मन के पार हो। यह सत्य है कि तुमने उसके साथ तादात्म बना लिया है, किन्तु तुम मन हो नहीं।

और यही ध्यान का उद्देश्य है: तुम्हे छोटी झलकियां दिखाना कि तुम मन नहीं हो। यदि कुछ क्षण के लिए भी मन ठहर जाए, तुम तब भी वहीँ के वहीँ हो! इसके विपरीत, तुम और भी ज्यादा उपस्थित होते हो, तुम्हारी उपस्थिति और भी ज्यादा प्रवाहमान हो जाती है।

मन का ठहर जाना ऐसा होता है जैसे एक जल-निकास जो लगातार तुम्हे खाली कर था, रुक जाये। अचानक तुम ऊर्जा से भर गए। तुम और संवेदनशील हो गए।

यदि तुम क्षण भर के लिए भी इस बात के प्रति सचेत हो जाओ कि मन नहीं है, केवल “मैं हूँ”, तुम सत्य के भीतरी केंद्र तक पहुँच गए। तब मन को गिरा देना सरल हो जाएगा। तुम मन नहीं हो अन्यथा तुम अपने आप को गिराओगे कैसे? पहले तादात्म को गिराना होगा, तब मन को गिराया जा सकता है
जब मन के साथ सारे तादात्म गिरा दिए जाये, जब तुम पर्वत पर बैठे एक द्रष्टा रह जाते हो और मन अँधेरी घाटियों कि गहराइयों में छूट जाता है। जब तुम सूर्य से प्रकाशित शिखरों पर होते हो, बस शुद्ध साक्षी, द्रष्टा मात्र, देखते हुए, परंतु किसी भी चीज़ से कोई तादात्म्य ना बनाते हुए–अच्छा या बुरा, पापी या पुण्यात्मा, यह या वह, केवल एक शुभ उपस्तिथी—एक श्वांस, एक धड़कता हुआ ह्रदय, उस द्रष्टा भाव में सब प्रश्न मिट जातें हैं। मन मिट जाता है, पिघल जाता है, भाप बन कर उड़ जाता है। तुम बस एक शुद्ध आत्मा की तरह रह जाते हो, एक शुद्ध अस्तित्व–एक श्वास, एक ह्रदय की धड़कन, पूर्णता क्षण में, ना अतीत, ना भविष्य इसलिए वर्तमान भी नहीं

मन भ्रामक है–जो होता तो नहीं है पर दिखता है, और इतना दिखता है कि तुम सोचते हो कि तुम मन हो। मन माया है, मन मात्र एक स्वप्न है, मन एक प्रक्षेपण है…एक पानी का बुलबुला–जिस में कुछ भी नहीं है, परन्तु ये एक पानी का बबूला नदी में तैरता प्रतीत होता है । सूरज बस उग ही रहा है, किरने बुलबुले में प्रवेश करती हैं और इंद्रधनुष निर्मित हो जाता है और उस में कुछ भी नहीं है। जब तुम बुलबुले को छूते हो तो वहटूट जाता है और सब-कुछ मिट जाता है—वो इंद्रधनुष, वो सौन्दर्य–कुछ भी नहीं बचता। केवल शुन्यता ही अनंत शून्य के साथ एक हो जाती है। वहां बस एक दीवार थी, एक बुलबुले कि दीवार। तुम्हारा मन एक बस एक बुलबुले कि दीवार है—भीतर, तुम्हारा शून्य है; बाहर, मेरा शून्य। यह मात्र एक बुलबुला है: छेद दो, और मन विदा हो जायेगा .
-ओशो 




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