महामूर्खता को मर्यादा नहीं कहना चाहिए।




रामायण से बहुत सारी शिक्षाएं मिलती है
जैसे : कई पत्नियों वाले रोंदू पिता के कहने पर बनवास पर नहीं जाना चाहिए।
बड़े भाई को बनवास में पत्नी साथ ले जानी हो तो छोटे को घर पर नहीं छोड़ आनी चाहिए।
पत्नी की ज़िद पर मूर्खों की तरह हिरण को मारने घंटों नहीं दौड़ना चाहिए।

किसी की बहन से झूठ बोलबोलकर एक दूसरे को अविवाहित नहीं बताना चाहिए। और जब स्वयंवर चाहने वाली सुंदरी को क्रोध आ जाए तो महाक्रोधी बनकर उसके नाककान नहीं काटने चाहिए।
बहन के अपमान का बदला लेने के लिए जब उसके भाई को क्रोध आए तो उसे घमंडी मानने से पहले अपनी मूर्खता को जांचना चाहिए।

अगर वह तुम्हारी पत्नी को उठा ले जाए और सम्मानपूर्वक स्त्रियों के बीच रखे तो उससे समझौता करना चाहिए,उसके पीछे उत्पाती बन्दर नहीं छोड़ने चाहिए।

उस पर हमला करने के लिए समुद्र पर पुल बनाने में समय नष्ट करने के बजाय आकाशमार्ग से जाने के लिए उड़ने वाले उस बन्दर की सेवाएं लेनी चाहिए जो हाथ में पर्वत लेकर आसानी से उड़ता है।

प्राण छोड़ते हुए शत्रु से अपने काम के नए मन्त्र नहीं मांगने चाहिए।

पत्नी के चमड़े वाले चरित्र की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए और अगर वह निर्दोष सिद्ध हो जाए तो दो कौड़ी के लोगों की मांग पर गर्भवती पत्नी को घर से नहीं निकालना चाहिए।

अगर पत्नी से प्रेम हो तो उसके पास वहाँ चले जाना चाहिए, जहां उसे अकेले छोड़ आए हो। फिर भी कष्ट हो तो पत्नी को घर सौंपकर खुद ही घर से निकल जाना चाहिए।

महामूर्खता को मर्यादा नहीं कहना चाहिए।

जब पत्नी आत्महत्या कर ले तो ही खुद भी आत्महत्या नहीं कर लेनी चाहिए, बल्कि चुल्लू भर पानी में निरंतर मरते-जीते रहना चाहिए। हो सके तो पहले ही धरती का बोझ कम कर देना चाहिए।

रावण और शम्बूक जैसे विद्वानों और जनहितैषियों को मारने दौड़ने से पहले अपनी नालायकियों का संहार करना चाहिए।

०००

मगर, रामू भैया !
तुम ठहरे ईश्वर का अवतार !
तुमसे और तुम्हारे बंदरों से कोई भूल कैसे हो सकती है?
तुम्हारी सारी कथा तो पहले ही लिख दी गई थी !
तुमने वही किया जो तुमसे कहा गया !

तुम अपने बंदरों सहित ऐसे ही रहना।
रावण के भूसे को हर वर्ष सहर्ष जलाते रहना।

अहा, गन्दगी !
मैं इस पर नाराज़ नहीं हूँ।
आनंदित हूँ !

तुम्हारे पक्ष में हूँ।
तुम होश की दवा किए बिना कैसे सुधर सकते हो?
जैसे हो, वैसे रहोगे !

मेरे कहे पर ध्यान न देना।
होई सोई जो रामू का भगवान् रचि राखा !

उठाओ नकली धनुष !
मारो नकली रावण !
तुम्हारी माता की जय !
तुम्हारे पिता की जय !

तुम में हम जैसे रचनाकारों ने जो खूबियां लगातार कई रामायणों में भरी और जिस प्रकार रावण को भी समझने की कोशिश हुई और निर्दोष सीता के हक़ में आवाज़ें उठीं, उससे एक नई रामायण बन चुकी है। वह अंधे गिरोहों की रामायण नहीं है, उन थोड़े से लोगों की रामायण है जो स्वयं को स्वयं रचते हैं।

‘अल्लाह हू’ का शोर मचा कर तालिबान की तरह निर्दोषों को मारने की दिशा में तुम नहीं निकल सकते, मेरे लिए यह बहुत है।

भारतीयता अंतिम उमीद है, इसे मैं बनाए रखूँगा।
मेरे जैसे और भी हैं।
अपनी खबर सतत रखने वाले !
जहां हम होते हैं वहाँ से देश शुरू होता है
अनंत का स्पेस !

जय राम जी की !
राम एक प्यारा शब्द है।
इसका अर्थ है रमा हुआ
रोम-रोम में
कणकण में।
यह ब्रह्मांडीय शब्द है
अयोध्या का राजनीतिक रामचंद्र नहीं।

Sabhar : Sainny Ashesh




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