मुहब्बत का महबूब – खलील जिब्रान / सैन्नी आशेष की कलम से




‘‘तुम्हारे और मेरे बीच का रिश्ता मेरी ज़िंदगी की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ है। मैंने अपने किसी भी जन्म में जितनी चीज़ें जानी हैं, उन सबमें यह सबसे अद्भुत रिश्ता है। यह शाश्वत रिश्ता है।’’

मेरी हेस्कल का ‘प्रोफेट’ ख़लील जिब्रान दुनिया से जा चुका है और वह उसके एक-एक शब्द में से गुज़र रही है…

उसके नाम लिखे हुए ख़लील जिब्रान के इस प्रेमपत्र में से कई पत्र निकल-निकल कर तितलियों की तरह उसकी आंखों के आगे उड़ रहे हैं…

‘‘जब हम इन जिस्मों में नहीं थे, तब से मैं तुमसे मुहब्बत करता आ रहा हूं। यह मैंने तुम्हें पहली बार देखते ही जान लिया था। यह नियत था। हम इस तरह से एक हैं कि कुछ भी हमें जुदा नहीं कर सकता।’’

वह अपने महान महबूब की एक-एक स्मृति को नए सिरे से अपने आंसुओं से धोती और संजोती जा रही है…

ख़लील जिब्रान का जन्म 6 जनवरी, 1883 को वर्तमान उत्तरी लेबनान के बषरी गांव में हुआ। उसकी मां का नाम कमीला और बाप का नाम ख़लील साद यूसुफ़ जिब्रान था।
बषरी इलाका देवदारों से भरी एक सुंदर पर्वतीय कदीषा घाटी से जुड़ा हुआ है। उन दिनों लेबनान ओटोमन राजशाही के अधीन सीरिया का हिस्सा था। आज बषरी लेबनान का एक अहम शहर हो गया है।

बचपन में जब ज्रिबान देखता कि कदीषा घाटी में तूफान आया है तो वह उस तरफ नाचता हुआ दौड़ पड़ता। उसे कुदरत से बहुत प्रेम था और अक्सर उसे सौंदर्य के लिए दीवाना होते देखा जाता। सहसा वह पेंसिल लेकर कुदरत की तस्वीरें बनाने लगता।

उसकी मां कमीला रूहानी चीजों और कुदरत के करिश्मों में दिलचस्पी लेने वाली शांत स्वभाव की स्त्री थी। वह जान गई थी कि उसका यह बेटा ग़ैरमामूली है और दुनिया को कुछ देने आया है। वह उसे कुदरती नजारों में खोया देखकर खुश होती और अपने बड़े बेटे और दोनों छोटी बेटियों से कहती कि उसे अकेला छोड़ दो।

बालक जिब्रान के बचपन की अनुभूतियां बाद में इस तरह सामने आईं-

‘मेरी आत्मा को इन रंगों में नहाने दो… नहाने दो… मुझे इस सूर्यास्त को निगल लेने दो… इस इंद्रधनुष को पी लेने दो…’

परंपरा के अनुसार ख़लील जिब्रान का नाम उसके पिता के नाम ख़लील साद यूसुफ़ जिब्रान में से लिया गया। टैक्स अफसर यूसुफ जिब्रान को जुएबाजी की लत थी और इस कारण वह कर्ज़ से दब कर एक अन्य मुलाजिम का बंधुआ सेवक हो गया था। खर्चे चलाने के लिए उसने अखरोट के कुछ पेड़ तो ख़रीदे थे, पर उनकी देखरेख नहीं करता था। तीस साल की कमीला एक धर्माधिकारी की बेटी थी।

यूसुफ़ जिब्रान से शादी करने से पहले भी दो बार उसकी शादी हुई थी और बच्चों की परवरिश की ख़ातिर उसने चुपचाप बहुत तकलीफें सही थीं। पिछले विवाह से उसे एक बेटा बतरस (पीटर) हुआ था। बोट्रोस और बुट्रस नामों से जाना गया पीटर जिब्रान से छह साल बड़ा था। जिब्रान के बाद उसकी दो बहनें मारियाना और सुल्ताना जन्मीं। पिता के जुएबाज़ और कर्ज़दार होने के कारण बच्चों को पढ़ाई-लिखाई मयस्सर नहीं हुई।

मां के घोर अकेलेपन, ख़ामोसही और रूहानी मिज़ाज का जिब्रान पर गहरा प्रभाव पड़ा। लोगों में उसके अनोखे स्वभाव के चर्चे होने लगे।
एक स्थानीय पुरोहित ने उसकी पढ़ाई का ज़िम्मा लिया और बाइबल के साथ ही उसे अरबी और सीरियाई भाशाएं पढ़ाने घर आने लगा। पुरोहित ने पाया कि ख़लील के पास अनोखी प्रतिभा और हुनरमंदी है। उसने उसे धार्मिक और शास्त्रीय तालीम देनी शुरु कर दी।

जिब्रान ने विज्ञान, भाषाशास्त्र और इतिहास में भी रुचि लेनी शुरू की।

1891 में अधिकारियों ने जिब्रान के पिता को टैक्स में हेराफेरी करने के जुर्म में जेल में डाल दिया। उसकी संपत्ति ज़ब्त कर ली गई और परिवार बेघरबार हो गया।

1895 में ये लोग काम की तलाश में अमरीका जा पहुंचे।
साल भर पहले जेल से छूटे जिब्रान के पिता ने लेबनान में ही रहने का फैसला किया। अरबी होने के कारण अमरीका में कमीला और बच्चों को दोयम दर्जें के नागरिक की भांति रहना था। कमीला बहुत मेहनत करते हुए बोस्टन की गलियों में पीठ पर सामान लादे घर-घर चीजें बेचकर बच्चों को पालने लगी।

रिवाजों और आर्थिक कठिनाई के कारण जिब्रान की दोनों बहनें पढ़ाई से वंचित रहीं, जबकि एक चेरिटेबल संस्था की मदद से जिब्रान स्कूल जाने लगा। यहीं अंग्रेजी के अध्यापक के सुझाव पर उसके नाम के हिज्जों में परिवर्तन हुआ और उसका नाम ख़लील की बजाय ‘क़हलील’ जैसा लगने लगा, हालांकि अरबी उच्चारण में यह उतना नहीं अखरता। कमीला की मेहनत रंग लाई और उसने अपने बड़े बेटे पीटर के लिए हार्डवेयर स्टोर खुलवा दिया, जिसमें मारियाना और सुल्ताना भी काम करने लगीं।

जिब्रान अंतर्मुखी था और अपना अधिक समय अकेले बिताता था, तो भी उसने बोस्टन की कलात्मक और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरु कर दिया।
वह आॅपेरा, थियेटर और आर्ट दीर्घाओं में जाने लगा।
इससे वहां के नामी कलाकारों ने जल्दी ही तेरह साल के जिब्रान की प्रतिभा को पहचान लिया और उसे मशहूर कलाकार फ्रेड हाॅलेंड डे से मिलवाया। डे ने जिब्रान के लिए कला, साहित्य, दर्शन पुराण, लेखन और छायाकारी के अध्ययन के लिए नए द्वार खोल कर उसमें छिपी संभावनाओं को खुला आकाश दे दिया।

1898 में जिब्रान किताबों के कवर डिजायन करके सबको चकित करने लगा। लेकिन उम्र से पहले इस उड़ान के खतरे भांपकर कमीला ने उसे शिक्षा पूरी करने के लिए वापस लेबनान भेजना ठीक समझा। लेबनान लौटकर वह बेरुत के एक बड़े स्कूल ‘अल-हिक्मा’ (द विज़डम) में दाखिल हो गया, जहां उसे अरबी भाषा और साहित्य में माहिर होना था। लेकिन जिब्रान का अधिक झुकाव चित्रकला में ही बना रहा।

(बाक़ी कल : स्त्री से प्रेम का पहला सबक़)




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