शरीर पर हमने प्रेम को ठहरा दिया। उसका नाम हमने विवाह रख दिया है।




जिस विवाह में प्रेम का मिलान नही ,वहीं विवाह ही अपवित्र है,ये सारे भगोड़े , इसी विवाह का हिस्सा हैं।विवाह में हम फिकर करते हैंऔर सब बातों की, सिर्फ प्रेम की नहीं…

ज्योतिषी से पूछते हैं, जन्म-कुंडलियां मिलाते हैं, हस्तरेखाओं की जांच करते हैं; वर के माता-पिता, प्रियजन, वृद्धजन, वधू के माता-पिता, प्रियजन,वृद्धजन, सब तरह का गणित बिठाते हैं, हिसाब लगाते हैं; सब खाता-बही जमाते हैं-धन कितना है,पद कैसा है, प्रतिष्ठा कैसी है, कुल कैसा है, भविष्य क्या है! एक बात भर बाद कर दी जाती है: न तो पूछते हैं जिसका विवाह हो रहा है उससे, न पूछते हैं उससे जिसके साथ विवाह हो रहा है। उन दोनों को बाद कर देते हैं। वह बात गौण है। वह व्यर्थ है। उसे बीच में लाना उचित नहीं। उसे बीच में लाने में खतरा है। क्योंकि मन बहुत जल्दी रूपांतरित होता है, क्षण-क्षण में बदलता है।

तो शरीर पर हमने प्रेम को ठहरा दिया। उसका नाम हमने विवाह रख दिया है। और विवाह को हम पवित्र कहते हैं। विवाह अपवित्र है। इसी कारण अपवित्र है कि वह शरीर पर ही रुका हुआ है- गंदा है। और विवाह की सड़ांध फिर लोगों को भगोड़ा बनाती है। ये जो लोग घर-द्वार छोड़ कर भाग गए हैं, इन्हें कोई संसार से विरक्ति नहीं हो गई है। संसार को तो जाना कहां, पहचाना कहां! वृक्षों से विरक्ति हो गई है, कि फूलों से,कि पहाड़ों से, कि नदियों से, कि चांदत्तारों से? विरक्ति हो गई है विवाह नाम की संस्थासे, उसकी सड़ांध से। परेशान हो गए, भाग खड़े हुए। और ये ही भगोड़े महात्मा बन गए हैं, साधु बन गए हैं। फिर ये भगोड़े दूसरों को भगोड़ापन सिखा रहे हैं।और बड़ा मजा है कि ये ही साधु-महात्मा विवाह को पवित्र कहते हैं, ये ही साधु-महात्मा विवाह के लिए आशीर्वाद देने आ जाते हैं।

खूब साजिश है! लोगों को विवाह में बांधो, फिर वे परेशान हों, पीड़ित हों, दुखी हों, तो फिर उनको मार्ग बताओ संसार-त्याग का। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

यह तुम्हारा पुराना विवाह और यह तुम्हारा पुराना संन्यास एक ही रोग के दो अंग हैं। और इसलिए साधु-महात्मा नहीं चाहेंगे कि विवाह दुनिया से विदा हो जाए। क्योंकि विवाह जिस दिन विदा होगा उसी दिन तुम्हारे तथाकथित साधु-संन्यासी भी विदा हो जाएंगे। क्योंकि इनको फिर संसार से विरक्त करने वाली चीज कौन-सी बचेगी? संसार से इन्हें कौन घबड़ा देता है? यह तुम देखो, पुरुष भागे हैं, स्त्रियां नहीं भागीं। उसका कारण है। स्त्री की क्षमता और सहनशीलता पुरुष से बहुत ज्यादा है। और कोई कारण नहीं है। मुझसे लोग पूछते हैं कि क्यों स्त्रियां बुद्ध नहीं हुईं, महावीर नहीं हुईं, कृष्ण नहीं हुईं, राम नहीं हुईं?

उनकी सहनशीलता पुरुष से ज्यादा है। यह गौरव की बात है। इसमें कुछ गौरव नहीं है।उनमें एक धैर्य है, अपार धैर्य है, जो पुरुषों में नहीं है। वैज्ञानिक भी इस बात से सहमत हैं। स्त्रियां कम बीमार पड़ती हैं पुरुषों की बजाय। पुरुष दोगुने बीमार होते हैं, स्त्रियों की बजाय। स्त्रियां कम पागल होती हैं पुरुषों की बजाय, पुरुष दोगुने पागल होते हैं स्त्रियों की बजाय। स्त्रियां कम आत्मघात करती हैं, पुरुष ज्यादा आत्मघात करते हैं–दोगुने। यह दोगुने का अनुपात हर दिशा में लागू है।

स्त्री में एक तरह की समतुलता है; एक तरह का धैर्य है; एक तरह का प्रसाद है। जरूरी था। क्योंकि उसे नौ महीने बच्चे को पेट में रखना है। कौन पुरुष नौ महीने बच्चे को पेट में रखने को राजी होगा! फिर नौ महीने पर ही बात खतम नहीं होती,फिर बच्चे को बड़ा करना है। रात में दस-पंद्रह बार जगाएगा,तो भी मां जग आती है, फिर सो जाती है। पुरुष को दस-पंद्रह बार जगाओ, संसार से विरक्ति हो जाएगी। पुरुष को नौ महीने गर्भ रखने दो पेट में, कि फिर तत्क्षण भाग खड़ा होगा।यह कष्ट पुरुष न सह सकेगा।

स्त्रियां पुरुषों से ज्यादा जीती हैं – पांच साल ज्यादा। दस-बारह-पंद्रह बच्चों को जन्म देने के बाद, बड़ा करने के बाद भी पांच साल ज्यादा जीती हैं। घर का सारा उपद्रव झेलने के बाद, घर-गृहस्थी की सारी झंझटें झेलने के बाद, फिर भी पांच साल ज्यादा जीती हैं। पुरुषों से ज्यादा देर में वृद्ध होती हैं। ज्यादा समय तक युवा रहती हैं। ज्यादा समय तक सुंदर रहती हैं। सारी असुविधाओं के बीच में! कारण है: प्रकृति ने उन्हें सहने की क्षमता दी है। और इसलिए स्त्रियां भागीं नहीं,जिंदगी से विमुख न हुईं। स्वभावतः स्त्रियों में उस तरह के महात्मा और साधु पैदा न हो सके जिस तरह के पुरुषों में हुए। लेकिन मैं इसे गौरव की बात मानता हूं, अगौरव की नहीं।

यह पुरुषों के संबंध में अगौरव है कि इनमें भगोड़े ज्यादा पैदा हुए। और ये पुरुष, ये महात्मा, ये साधु-संत, इनके वक्तव्य देखो क्या हैं! इनके सारे वक्तव्य स्त्री-विरोधीहैं। शास्त्रों में सिवाय स्त्री की निंदा के और कुछ भी नहीं है। तो उससे एक बात तो जाहिर होती है कि ये सारे लोग स्त्री से पीड़ित रहे हैं, स्त्री से घबड़ाए रहे है ये स्त्री को ही छोड़ कर भागे है ।इतना तय है ।

– ओशो




Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*