साक्षीभाव क्या है ?




साक्षीभाव क्या है?
उसे हम जगाना चाहते हैं।
क्या वह भी चित्त का एक अंश नहीं होगा ?
कि चित्त से परे होगा?

प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है, और ठीक से समझने योग्य है। साधारणत: हम जो भी जानते हैं, जो भी करते हैं, जो भी प्रयत्न होगा, वह सब चित्त से होगा, मन से होगा, माइंड से होगा। अगर आप राम—राम जपते हैं, तो जपने की क्रिया मन से होगी। अगर आप मंदिर में पूजा करते हैं, तो पूजा करने की क्रिया मन का भाव होगी। अगर आप कोई ग्रंथ पढ़ते हैं, तो पढ़ने की क्रिया मन की होगी। और आत्मा को जानना हो, तो मन के ऊपर जाना होगा। मन की कोई क्रिया मन के ऊपर नहीं ले जा सकती है। मन की कोई भी क्रिया मन के भीतर ही रखेगी।

स्वाभाविक है कि मन की किसी भी क्रिया से, जो मन के पीछे है, उससे परिचय नहीं हो सकता। यह पूछा है, यह जो साक्षीभाव है, क्या यह भी मन की क्रिया होगी? नहीं, अकेली एक ही क्रिया है, जो मन की नहीं है, और वह साक्षीभाव है। इसे थोड़ा समझना जरूरी है।

और केवल साक्षीभाव ही मनुष्य को आत्मा में प्रतिष्ठा दे सकता है, क्योंकि वही हमारे जीवन में एक सूत्र है, जो मन का नहीं है, मांइड का नहीं है।

आप रात को स्वप्न देखते हैं। सुबह जागकर पाते हैं कि स्वप्न था, और मैंने समझा कि सत्य है। सुबह स्वप्न तो झूठा हो जाता है, लेकिन जिसने स्वप्न देखा था, वह झूठा नहीं होता। उसे आप मानते हैं कि जिसने देखा था वह सत्य था, जो देखा था वह स्वप्न था। आप बच्चे थे, अब युवा हो गये। बचपन तो चला गया, युवापन आ गया। युवावस्था भी चली जायेगी,बुढ़ापा आ जायेगा। लेकिन जिसने बचपन को देखा,युवावस्था को देखा, बुढ़ापे को देखेगा, वह न आया, न गया;वह मौजूद रहा। सुख आता है, सुख चला जाता है; दुःख आता है, दुःख चला जाता है। लेकिन जो दुःख को देखता है और सुख को देखता है, वह मौजूद बना रहता है।

तो हमारे भीतर दर्शन की जो क्षमता है, वह सारी स्थितियों में मौजूद बनी रहती है। साक्षी का जो भाव है, वह हमारी जो देखने की क्षमता है, वह मौजूद बनी रहती है। वही क्षमता हमारे भीतर अविच्छिन्न रूप से, अपरिवर्तित रूप से मौजूद है। आप बहुत गहरी नींद में हो जाएं, तो भी सुबह कहते हैं, रात बहुत गहरी नींद आयी, रात बड़ी आनंदपूर्ण निद्रा हुई। आपके भीतर किसी ने उस निंद्रापूर्ण अनुभव को भी जाना। उस आनंदपूर्ण सुषुप्ति को भी जाना। तो आपके भीतर जाननेवाला, देखनेवाला जो साक्षी है, वह सतत मौजूद है।

मन सतत परिवर्तनशील है, और साक्षी सतत अपरिवर्तनशील है। इसलिए साक्षीभाव मन का हिस्सा नहीं हो सकता। और फिर, मन की जो—जो क्रियाएं हैं, उनको भी आप देखते हैं। आपके भीतर विचार चल रहे हैं, आप शांत बैठ जायें, आपको विचारों का अनुभव होगा कि वे चल रहे हैं;आपको दिखायी पड़ेंगे, अगर शांत भाव से देखेंगे तो विचार वैसे ही दिखाई पड़ेंगे, जैसे रास्ते पर चलते हुए लोग दिखायी पड़ते हैं। फिर अगर विचार शून्य हो जायेंगे, विचार शांत हो जायेंगे, तो यह दिखायी पड़ेगा कि विचार शांत हो गये हैं, शून्य हो गये हैं; रास्ता खाली हो गया है। निश्चित ही जो विचारों को देखता है, वह विचार से अलग होगा। वह जो हमारे भीतर देखने वाला तत्व है, वह हमारी सारी क्रियाओं से, सबसे भिन्न और अलग है।

जब आप श्वास को देखेंगे, श्वास को देखते रहेंगे,देखते—देखते श्वास शांत होने लगेगी। एक घड़ी आयेगी,आपको पता ही नहीं चलेगा कि श्वास चल भी रही है या नहीं चल रही है। जब तक श्वास चलेगी, तब तक दिखायी पड़ेगा कि श्वास चल रही है; और जब श्वास नहीं चलती हुई मालूम पड़ेगी, तब दिखाई पड़ेगा कि श्वास नहीं चल रही है लेकिन दोनों स्थितियों में देखने वाला पीछे खड़ा हुआ है।

यह जो साक्षी है, यह जो विटनेस है, यह जो अवेयरनेस है पीछे, बोध का बिंदु है— यह बिंदु मन के बाहर है; मन की क्रियाओं का हिस्सा नहीं है। क्योंकि मन की क्रियाओं को भी वह जानता है। जिसको हम जानते हैं, उससे अलग हो जाते हैं। जिसको भी आप जान सकते हैं, उससे आप अलग हो सकते हैं; क्योंकि आप अलग हैं ही। नहीं तो उसको जान ही नहीं सकते। जिसको आप देख रहे हैं, उससे आप अलग हो जाते हैं, क्योंकि जो दिखायी पड़ रहा है, वह अलग होगा और जो देख रहा है, वह अलग होगा।

साक्षी को आप कभी नहीं देख सकते। आपके भीतर जो साक्षी है, उसको आप कभी नहीं देख सकते। उसको कौन देखेगा? जो देखेगा, वह आप हो जायेंगे और जो दिखायी पड़ेगा, वह अलग हो जायेगा। साक्षी आपका स्वरूप है। उसे आप देख नहीं सकते। क्योंकि देखनेवाला, आप अलग हो जायेंगे, तो फिर वही साक्षी होगा जो देख रहा है। जो दृश्य बन जायेगा, आब्जेक्ट बन जायेगा, वह फिर आत्मा नहीं रहेगी।

साक्षीभाव जो है, वह आत्मा में प्रवेश का उपाय है। असल में पूर्ण साक्षी स्थिति को उपलब्ध हो जाना स्वरूप को उपलब्ध हो जाना है। साक्षी मन की कोई क्रिया नहीं है। और जो भी मन की क्रियाएं हैं, वे फिर ध्यान नहीं होंगी। इसलिए मैं जप को ध्यान नहीं कहता हूं। वह मन की क्रिया है। किसी मंत्र को स्मरण करने को ध्यान नहीं कहता हूं, वह भी मन की क्रिया है। किसी पूजा को, किसी पाठ को ध्यान नहीं कहता हूं; ये सब मन की क्रियाएं हैं। सिर्फ एक ही आपके भीतर रहस्य का मार्ग है, जो मन का नहीं है—वह साक्षी का है। जिस—जिस मात्रा में आपके भीतर साक्षी का भाव गहरा होता जायेगा, आप मन के बाहर होते जायेंगे। जिस क्षण साक्षी का भाव पूरा प्रतिष्ठित होगा, आप पायेंगे : मन नहीं है।

भारत से एक भिक्षु कोई चौदह सौ, पंद्रह सौ वर्ष पहले चीन गया, नाम था बोधिधर्म। जब वह चीन गया, उसके पहले उसकी ख्याति पहुंच गयी। सारे चीन में उसकी चर्चा हो गयी उसके पहुंचने के पहले। वैसा व्यक्ति था, अदभुत था। चीन का जो राजा था बू नाम का, वह उसका स्वागत करने सीमा पर दो मील चलकर आया। उसने स्वागत किया बोधिधर्म का और बोधिधर्म से पूछा, ‘मैंने बहुत विहार बनवाये, मंदिर बनवाये, भगवान बुद्ध की हजारों—हजारों मूर्तियां बनवायीं,धर्म का प्रचार किया, धर्मशालाएं बनवायीं, लाखों भिक्षुओं को भोजन कराता हूं। मेरे इन सारे पुण्य कर्मों का क्या फल होगा?’बोधिधर्म ने कहा, ‘कुछ भी नहीं। ‘ वह बू चौंक गया। जो भिक्षु आते थे, वे कहते थे, ऐसा करो, इससे बहुत लाभ है, बहुत पुण्य है।

बोधिधर्म ने कहा, ‘कुछ भी नहीं। और यह भी मत सोचना कि इनका कोई धर्म से संबंध है। ‘ वह बहुत हैरान हुआ। उसने पूछा, ‘फिर धर्म का किस बात से संबंध है?’ तो बोधिधर्म ने कहा, ‘तुमने मंदिर बनवाये, तुमने भिक्षुओं को भोजन कराया, या तुमने धन बांटा, या मूर्तियां खड़ी कीं। जब तुम यह सब कर रहे थे, तो तुम्हारे भीतर कोई जानता है कि यह सब हो रहा है, यह सब किया जा रहा है। वह जो साक्षी है,जो तुम्हारे भीतर जानता है, अगर उसमें प्रतिष्ठित हो जाओ, तो धर्म है। मंदिर बनाने में नहीं, मंदिर में पूजा करने में नहीं। वह जो मंदिर के बनाने को भी देखता है और जानता है, और मंदिर की पूजा को भी देखता है और जानता है…।

‘कभी मंदिर में पूजा करते वक्त एकदम से खयाल करें, तो आपको पता चलेगा, आप पूजा भी कर रहे हैं और आपके भीतर एक बिंदु है, जो जान भी रहा है कि पूजा हो रही है, पूजा की जा रही है। रास्ते पर आप चल रहे हैं, चलते वक्त एकदम से खयाल करें, तो दिखायी पड़ेगा कि आप चल रहे हैं और आपके भीतर कोई जान भी रहा है कि आप चल रहे हैं। वह जो जान रहा है, वह आत्यंतिक रूप से अंतरस्थ केंद्र है। आपकी इनरमोस्ट, सबसे गहरी स्थिति है, जहां आप थे, जहां आपका स्वरूप है। बोधिधर्म ने कहा, वहां प्रतिष्ठित हों, तो धर्म में प्रतिष्ठित हैं। बाकी सब अच्छे काम हैं, धर्म से उनका कोई गहरा संबंध नहीं है। ‘

वह बू बोला कि ‘ अगर ऐसी बात है, तो मेरा चित्त बहुत अशांत रहता है, उसी के लिए मैने यह धर्म के कार्य किये। मेरा चित्त कैसे शांत हो जाये, यह बतायें। ‘ बोधिधर्म ने उसे देखा और कहा, ‘कल सुबह चार बजे अंधेरे में आ जाना,तो तुम्हारे चित्त को शांत कर ही दूंगा। ‘ ऐसा कहने वाला कभी कोई व्यक्ति उसे मिला नहीं था। उसने दुबारा पूछा, ‘क्या मेरे चित्त को शांत कर ही देंगे?’ बोधिधर्म ने कहा, ‘ अब दुबारा मत पूछो। सुबह चार बजे आ जाना। दुबारा पूछने की क्या बात है?मैंने कहा कि चित्त को शांत कर ही दूंगा। तुम जाओ।

‘जब वह सीढियां उतरने लगा, तो बोधिधर्म ने कहा, ‘खयाल रखना, जब आओ, तो चित्त को साथ लेते आना। नहीं तो मैं शांत किसको करूंगा?’ रास्ते में बादशाह सोचने लगा कि यह तो बडी गड़बड़ बात है, चित्त को साथ लेते आना! जब मैं आऊंगा, तो चित्त तो साथ आयेगा ही। इसमें क्या बात थी कहने की, यह कैसा पागल आदमी है! चित्त को साथ लेते आना, इसका क्या मतलब है? मैं आऊंगा, तो चित्त साथ आयेगा ही।

सुबह वह चार बजे क्या, तीन बजे ही आ गया। आते ही बोधिधर्म ने पूछा, ‘लाये? चित्त को ले आये?’ उसने कहा, ‘आप कैसी बातें करते हैं। मैं आया हूं तो चित्त तो आयेगा ही!’उसने कहा आंख बंद करो, ‘खोजो, चित्त कहां है। मिल जाये,तो पकड़ो और कहो, यह है। और मैं उसी वक्त शांत कर दूंगा।

‘उस फकीर के साथ उस अंधेरी रात में उस बादशाह ने आंख बंद की, भीतर खोजा और आंख थोड़ी देर बाद खोली, और कहा, ‘वह मिलता नहीं। ‘ तो बोधिधर्म ने कहा, ‘जो मिलता ही नहीं, वह शांत हो गया। तुमने कभी खोजा ही नहीं। ‘ और वह हैरान हुआ। बादशाह भीतर जब खोजने गया,तो वहां सब शांत!

असल में जब आप भीतर खोजने जायेंगे, तो सिर्फ साक्षी रह जायेगा, खोजनेवाला रह जायेगा। और अगर खोजने वाला बहुत प्रतिष्ठा से, बहुत शक्ति से अपने भीतर जाये, तो चित्त पाया ही नहीं जायेगा। चित्त हमारे सोये हुए होने का नाम है। चित्त हमारे भीतर साक्षी जितना मूर्च्छित है, उसका नाम है। चित्त कुछ है नहीं। साक्षी की ही मूर्च्‍छा का नाम चित्त है—मन। अगर साक्षी सजग हो जाये, मन नहीं पाया जायेगा।

ओशो

 




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