सुंदर स्त्रियां बाहर से जितनी सुंदर होती हैं, उतनी भीतर से कुरूप हो जाती हैं। संतुलन रखती हैं।




सुंदर स्त्रियां बाहर से जितनी सुंदर होती हैं, उतनी भीतर से कुरूप हो जाती हैं। संतुलन रखती हैं। अक्सर ऐसा होगा कि सुंदर स्त्री की जबान कड़वी होगी; व्यवहार कठोर होगा; हेंकड़पन होगा; अहंकार होगा। सुंदर स्त्री भीतर से दुर्गंध देगी। सुंदर पुरुष के साथ भी यही बात है।

कुरूप स्त्री—परिपूरक खोजने पड़ते हैं उसे। देह में तो सौंदर्य नहीं है, इसलिए सेवा करेगी; प्रेम करेगी; चिंता लेगी। दुर्व्यवहार न करेगी, क्योंकि दुर्व्यवहार तो वैसे ही काफी हो रहा है! वह तो चेहरे के कारण ही काफी हुआ जा रहा है; देह के कारण ही काफी हुआ जा रहा है। अब और तो क्या सताना!

तो अक्सर ऐसा हो जाता है, कुरूप व्यक्ति भीतर से सुंदर हो जाते हैं। बाहर से सुंदर व्यक्ति भीतर से कुरूप हो जाते हैं। सुंदर को अकड़ होती है कि तुम नहीं तो कोई और सही! कुरूप को अकड़ नहीं होती; तुम ही सब कुछ हो!

सुकरात को इस दुनिया की खतरनाक से खतरनाक औरत मिली थी, झेनथेप्पे उसका नाम था। मगरमच्छ कहना चाहिए स्त्री नहीं। मारती थी सुकरात को! सुकरात जैसा प्यारा आदमी! मगर परमात्मा अक्सर ऐसे प्यारे आदमियों की बड़ी परीक्षाएं लेता है। भेजी होगी झेनथेप्पे को—कि लग जा इसके पीछे! मारती थी। डांटती थी। बीच—बीच में आ जाती। सुकरात अपने शिष्यों को समझा रहे हैं, वह बीच में खड़ी हो जाती—कि बंद करो बकवास! एक बार तो उसने लाकर पूरी की पूरी केतली गरम पानी कीं—चाय बना रही थी, क्रोध आ गया—सुकरात समझा रहा होगा कुछ लोगों को, उसने पूरी केतली उसके सिर पर आकर उंडेल दी। सुकरात का चेहरा सदा के लिए जल गया। आधा चेहरा काला पड़ गया।

तो उस युवक ने पूछा इसीलिए आपसे पूछने आया हूं कि आप भुक्तभोगी हैं; आप क्या कहते हैं ? विवाह करूं या न करूं? सुकरात ने कहा. करो। अगर स्त्री अच्छी मिली, तो सुख पाओगे। अगर मेरी जैसी स्त्री मिली, दार्शनिक हो जाओगे। लाभ ही लाभ है।

अब तुम कह रहे हो कि कुरूप स्त्री.!
कुरूप स्त्री पर ध्यान अगर करो, तो विराग— भाव पैदा होगा। विरागी हो जाओगे। चूको मत अवसर। अगले जन्म में कहीं भूल—चूक से सुंदर स्त्री मिल जाए, तो झंझटें आएंगी।

सौंदर्य भीतर है, बाहर नहीं। सौंदर्य स्वयं में है। और जिस दिन तुम्हारे भीतर सौंदर्य उगेगा, उस दिन सब सुंदर हो जाता है। तुम जैसे, वैसी दुनिया हो जाती है। जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि।
तुम सुंदर हो जाओ। पत्नी को सुंदर करने की फिकर छोड़ो। तुम सुंदर हो जाओ। और तुम्हारे सुंदर होने का अर्थ, कोई प्रसाधन के साधनों से नहीं; ध्यान सुंदर करता है। ध्यान ही सत्यं शिवं सुंदरम् का द्वार बनता है।

जैसे – जैसे ध्यान गहरा होगा. वैसे—वैसे तुम पाओगे : तुम्हारे भीतर एक अपूर्व सौंदर्य लहरें ले रहा है। इतना सौंदर्य कि तुम उंडेल दो, तो सारा जगत सुंदर हो जाए। मुझसे तुम उस सौंदर्य की बात पूछो। इस तरह के व्यर्थ प्रश्न न लाओ, तो अच्छा है।

ओशो – एस धम्मो सनंतनो-(ओशो)-प्रवचन-116

सुंदर और कुरूप

सुंदर और कुरूप मान लीजिए आप किसी मेहराब को सुंदर कहते हैं और कोई दूसरा उसे कुरूप कहता है। अब कौन सी बात महत्वपूर्ण है? इस बात को लेकर कि वस्तु सुंदर है या कुरूप, आपस में लड़ना अच्छा है या सौंदर्य और कुरूपता इन दोनों के प्रति संवेदनशील होना?

हमारे जीवन में भी तो गंदगी, मलिनता, अपमान, दुख और आंसू हैं और उसी में सुख, हंसी और सूर्य के प्रकाश में खिलने वाले फूल का सौंदर्य है। महत्व का विषय तो यह है कि हम निश्चित रूप से प्रत्येक वस्तु के प्रति संवेदनशील हों, हम यह निर्णय न करें कि क्या सुंदर है और क्या कुरूप। ऐसा करके हम खुद को सिद्धांतों में बांध लेते हैं।

यदि मैं यह कहूं कि मैं सौंदर्य की साधना कर रहा हूं और कुरूपता का तिरस्कार, तब क्या होगा? तब सौंदर्य की साधना ही असंवेदनशीलता को जन्म देगी। यह ठीक वैसा ही होगा, जैसे कोई व्यक्ति अपनी दाहिनी भुजा को अधिक मजबूत बनाए और बाईं को सूख जाने दे। अत: आपको सौंदर्य और कुरूपता, दोनों के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा।

आपको नृत्य करती हुई पत्तियां, पुल के नीचे प्रवाहित पानी अथवा संध्या के सौंदर्य की अनुभूति करनी होगी, लेकिन साथ में आपको गली के भिखारी के प्रति सजग होना होगा। उस गरीब स्त्री को भी देखना होगा, जो भारी बोझ के साथ संघर्ष कर रही है। आपको उसकी सहायता करनी होगी। उसके बोझ को हाथ लगाना होगा। यह आवश्यक है, तभी आपमें प्रत्येक वस्तु के प्रति संवेदन-क्षमता का विकास होगा। तब आप सिर्फ काम करेंगे, सहायता करेंगे और किसी की निंदा व तिरस्कार नहीं करेंगे।

– जे कृष्णमूर्ति




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