हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें हमारे जीवन के मूलभूत काम नही सिखाती




◆मूर्खतापूर्ण है हमारे देश की स्कूल व्यवस्था◆

कोई आपसे आपके दोस्त की शादी के बारे में पूछे कि क्या तुम्हें याद है उसकी बारात की धमाल, तो आपके दिमाग में शुरू से आखिर तक का पूरा सफर ताज़ा हो जाएगा और आप उसे बता देंगे। कोई आपसे किसी मूवी की स्टोरी पूछे तो भी आप उसके सारे सीन्स याद करके बता सकते हैं। लेकिन कोई अगर आपसे कहे कि कल टीचर ने क्या पढ़ाया था? तो आपको याद नही आएगा। या उस क्लास से तुमने क्या सीखा तो भी याद नहीं आएगा। कुल मिलाकर अगर आप 12वी तक पढ़े हैं तो मुश्किल से आपको आपकी 12 क्लासेस याद आजाए जिसमें कुछ यादगार हुआ था तो गनीमत है। अब यहां पर मंद से मंद बुद्धि को उपरोक्त सब बातें याद हैं लेकिन स्कूल की बातें याद नहीं! ऐसा क्यों? क्यों हमें कक्षाओं में पढ़ाया गया याद नहीं रहता? क्यों हम उसे भूल जाते हैं?

इसका सबसे पहला कारण तो है हमारी शिक्षा का बहुत ज्यादा नीरस या बोरिंग होना और दूसरा कारण है शिक्षा का अव्यवहारिक होना। नीरस कोर्स और पढ़ाने का तरीका हम सभी को कुंठित करता है और इसकी अव्यहारिकता हमें पढ़ने से रोकती है। हमारा मस्तिष्क तस्वीरों या इमेजेस को याद रखता है लेकिन कोर्स वाली किताब अक़्सर केवल नीरस शब्दों और लाइन्स में होती हैं जिसे याद रखना हर मस्तिष्क के लिए मुश्किल है।

हमारी शिक्षा व्यवस्था हमें हमारे जीवन के मूलभूत काम नही सिखाती जैसे- परिवार के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाने की कला, मित्रों के साथ व्यवहार या मित्र बनाने की कला, जीवनसाथी के साथ व्यवहार या जीवनसाथी कैसे चुने इसका ज्ञान, मुसीबत के समय हमारा व्यवहार और निर्णय क्या हो, सेहत का महत्व और उसे कैसे बनाए रखे वह ज्ञान, और तो और मस्तिष्क को यह व्यवस्था ट्रेंड करती है यह दावा करती है लेकिन यह नहीं बताती कि मस्तिष्क कैसे काम करता है और इसकी क्षमता को कैसे बढ़ाया जा सकता है…अनंत प्रश्न हैं। क्या मैंने जो बातें गिनाई हैं उसके बिना जीवन में आनंद या सुकून पाया जा सकता है जो कि जीवन का मूल उद्देश्य है? नहीं, बिल्कुल नहीं।

परीक्षा का पैटर्न मूर्खतापूर्ण है जिसे मैं बार बार हर जगह ‘जंगल के जानवरों की परीक्षा वाली नीति कथा’ से समझाता रहा हूँ। एक फिक्स से पैटर्न, एक नीरस सी परीक्षा जो कि केवल तनाव बढ़ा कर कुछ बच्चों को अच्छा और अनगिनत को निराश अनुभव करवाती है। अगर कोई बच्चा चित्र के माध्यम से समझा सकता है तो क्यों उसे निबंधात्मक उत्तर लिखने के लिए मजबूर किया जाता है? अगर कोई बोल कर उत्तर देना चाहता है तो क्यों उससे कलम घिसवाकर ही जवाब देने के लिए मजबूर किया जाता है? जबकि वह बोलकर अपनी बात बहुत बेहतर तरीके से समझा सकता है। क्या स्त्री और पुरुष दोनों से एक ही परीक्षा के द्वारा उनमें से श्रेष्ठ को चयनित किया जा सकता है? क्या आप गाय और बेल दोनों से खेत जुतवाने का काम ले सकते हैं?

बेवजह के विषयों का बोझ। जिन विद्यर्थियों को डॉक्टर ही बनना है उन्हें बेवजह के विषय 12वी कक्षा तक क्यों पढ़ाए जाते हैं? इसी तरह इंजीनियरिंग करने वाले, सीए करने वाले, वैज्ञानिक बनने वालों को बेवजह के विषय कक्षा 12 तक क्यों? हमारी शिक्षा व्यवस्था हर साल करोड़ो बच्चों के अमूल्य समय और श्रम को बर्बाद कर रही है… जिसे बहुत आसानी से बचाया जा सकता है।

हक़ीक़त में समस्या यह है कि इसके लिए अभिभावकों को आगे आना होगा। क्योंकि बच्चे जो इसे भुगत रहे हैं उन्हें इसका हमारी उम्र तक आने के बाद पता चलेगा, नीति निर्माताओं को केवल मूर्खतापूर्ण खाना पूर्ति करना है, और शिक्षकों को केवल तनख्वाह से मतलब है। अगर आप आज इस समस्या के हल के लिए आगे नहीं आये तो आने वाली पीढियां आपको कभी माफ नही करेगी।

पुनश्च: एक प्रसिद्ध लिफ्ट बनाने वाले ने मुझे कहा कि वह इंजीनियरिंग नहीं कर पाया क्योंकि वह अपनी बात को लिख नहीं सकता था और अंग्रेजी में तो बिल्कुल नहीं। लेकिन आज मेरे नीचे कई इंजीनियर काम करते हैं। मैं ज्यादा पढ़ नहीं पाया, लेकिन पढ़ाई छोड़ने के बाद मैं लिफ्ट बनाने का काम सीखने लगा और कुछ सालों में ही उसका एक्सपर्ट होगया, लगभग 2 सालों में, अगर पढ़ाई करता तो 10 से 12वी में पहुँचता। मैंने अपने जीवन के 4 साल बचाए न सर और बहुत सा खर्च जो पढ़ाई पर होता वह भी। मैंने उसे बस यही कहा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था आप जैसे जीनियस को पढ़ाने के लायक अभी नहीं है… शायद आने वाले कुछ सालों में हो जाए।

साभार ~डॉ अबरार मुल्तानी Dr.Abrar Multani

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