हम सब इतने कठोर हैं कि प्रेम की तरलता हमें पागलपन ही मालूम हो सकती है ……..




 

मैंने सुना है, एक कवि था,
*रिल्के*। जिन लोगों ने रिल्के को *कपड़े भी पहनते* देखा है
वे कहते थे कि हम हैरान हो जाते थे।

जिन लोगों ने उसे *खाना खाते* देखा है वे कहते थे हम हैरान हो जाते हैं।

जिन लोगों ने रिल्के को *जूते पहनते* देखा है वे कहते थे वह
अदभुत थी घटना—यह देखना कि वह कैसे जूते पहन रहा है!
वह तो ऐसे जूते पहनता था जैसे जूते भी जीवित हों, *वह तो उनके साथ ऐसे व्यवहार करता था जैसे वे मित्र हों।*

वह *कपड़े पहनता* तो वह
यह ही नहीं पूछता था कि कौन
सी कमीज मुझे अच्छा लगेगा।
वह कमीज से यह भी पूछता कि क्या इरादे हैं, मैं तुम्हें अच्छा लगूंगा? वह कोट भी ऊपर डालता तो कोट से भी पूछता,
क्या खयाल है, चल सकूंगा मैं तुम्हारे साथ?

यह तो कभी हमने सोचा भी न होगा?

हमने यह बात कई बार सोचा है दर्पण के सामने खड़े होकर कि
यह कोट चल सकेगा मेरे साथ, क्योंकि कोट है मुर्दा, हम हैं जिंदा; कोट को हमारे साथ चलना है।

लेकिन रिल्के
को लोगों ने सुना है,
आईने के सामने खड़ा है
और पूछ रहा है कि *दोस्त चल सकूंगा मैं तुम्हारे साथ?*

जूता उतार रहा है
तो उसे पोंछ रहा है।
उसे, जूते को रखा है तो
उसे धन्यवाद दिया है कि तुम्हारी कृपा! दो मील तक तुम मेरे साथ थे। *दो मील तक तुमने मेरी सेवा की है और उसकी आंखों से आंसू बह रहे हैं।*

*पागल आदमी मालूम होगा हमें।* निश्चित ही पागल मालूम होगा, क्योंकि हम सब इतने कठोर हैं कि प्रेम की तरलता हमें
पागलपन ही मालूम हो सकती है
और कुछ हमें मालूम नहीं हो सकता है। लेकिन यह सवाल भी नहीं है कि इससे जूते को कुछ फायदा हो गया होगा कि नहीं हो गया होगा,

कि कोट ने सुना होगा कि नहीं सुना होगा। यह इररिलेवेंट है,
यह असंगत है।

लेकिन जो आदमी कोट और जूते
और पत्थर और दरवाजे के प्रति भी इतना सदय, इतनाकरुणापूर्ण, इतना अनुग्रह से भरा हुआ है,
यह आदमी दूसरा आदमी हो गया है। इस आदमी से किसी आदमी के प्रति कठोर होने की संभावना
हो सकती है?

यह असंगत है बात कि कोट ने सुना कि नहीं सुना। *मैं तो यही* मानता हूं कि कोट भी सुनता है,लेकिन मेरी बात मानने की कोई जरूरत नहीं है।*

लेकिन यह आदमी,
यह व्यक्ति,
यह जो इतना प्रेमपूर्ण है,
इतना करुणापूर्ण है,
यह जो इतना धन्यवाद से भरा हुआ है जूते के प्रति भी,
यह आदमी इस व्यवहार
से *रूपांतरित* हो रहा है।
यह आदमी बदल रहा है,
यह आदमी दूसरी तरह
का आदमी हो जाएगा।

यह आदमी कठोर हो सकता है?
यह आदमी हिंसक हो सकता है?
यह आदमी क्रोध से देख भी सकता है आंख उठा कर? यह असंभव है। और इस आदमी में बहाव होगा, *इस आदमी की चेतना एक तरल सरिता बन जाएगी।*

निश्चित ही ऐसे आदमी को
देखना भी एक अनुभव है।
*लेकिन हमें वह आदमी*
*पागल ही मालूम होगा।*

हम सब इतने बुद्धिमान हैं
अपनी कठोरता में कि प्रेम
सदा ही पागलपन मालूम पड़ेगा।

लेकिन अगर तोड़ना है कभी
तो थोड़ा-बहुत पागल होना जरूरी है, प्रेम की दिशा में थोड़ा पागल होना जरूरी है, करुणा की दिशा में थोड़ा पागल होना जरूरी है।

— ओशो




Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*