Life skatch of Gurdjieff




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From GURDJIEFF

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Life skatch of Gurdjieff….🦋🦋🍁🦋🦋🍁🦋🦋
कोई संदेह नहीं है . यह आदमी बहुत अद्भुत था.
गुरजिएफ 1870 में पैदा हुए थे और 1949 में इनका निधन हो गया था . वे दक्षिण रूस में Alexandropoulos नाम के एक छोटे गाँव में पैदा हुए थे. उनके पिता एक ग्रीक आदमी थे और मां अर्मेनियाईन थी. उनके शिक्षक एक ईसाई पादरी थे. जब वह छोटे थे, उनके शिक्षक का उनके मन पर बहुत प्रभाव था. गुरजिएफ के पिताजी भी अप्रत्यक्ष रूप से उनके शिक्षक थे. वह अपने पिता को बहुत प्यार करते थे. इसलिए उनके पिताजी ने भी उनके जीवन में महत्वपूर्ण प्रभाव डाला था. ये दोनों लोग ही गुर्जिएफ़्फ़ के जीवन को आकार देने के लिए जिम्मेदार थे. गुर्जिएफ़्फ़ बचपन से ही हमेशा यही सवाल पूछा करते थे कि ” हम यहाँ क्यों हैं …? और “जीवन क्या है और मौत क्या है …? ”
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वह अपने जवान बहन की मृत्यु के समय उपस्थित थे . उन्होंने अपनी पुस्तक “Meeting With A Remarkable Man “ में वर्णित किया गया है कि उन्होंने एक लकवाग्रस्त आदमी जो चलने में असमर्थ था वह भी अपने वील पॉवर से, संत की कब्र पर चलते चलते पहुचता हुआ देखा था. गुरजिएफ ज्योतिषिओं से या भविष्य बताने वालों से बहुत प्रभावित होते थे. वे सम्मोहित यजदी लड़के को वृत्त में देखकर चकित थे. उन्होंने सम्मोहन सीखा, और सम्मोहन की विद्द्या में के उस्ताद बन गए. गुर्जिएफ़्फ़ को धीरे धीरे समजने लगा की उनके शिक्षकों को भी सभी विषयों की स्पष्ट समझ नहीं थी.
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गुरजिएफ ने न्यूरो-सायकोलोजी और रसायन शास्त्र का अभ्यास किया और, ईसाई शाश्त्रो का भी अभ्यास किया . फिर वह एक चिकित्सक और ईसाई पादरी बनने समर्थ हो गए . गुर्जिएफ़्फ़ को शरीर विज्ञान (Neurophysiology) और मनोविज्ञान में बहुत दिलचस्पी थी. वह जो देख रहे थे या ढूंढ रहे थे , वह पुस्तकालय की किताबों में नहीं था. उन्होंने सोचा कि दुनिया में जरुर कहीं कुछ वास्तविक ज्ञान होना चाहिए. उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है कि उन्होंने कई गुप्त ज्ञान जानने वाले समूह और धार्मिक समूहों के साथ संपर्क बनाने की कोशिश की थी. उन्होंने इस तरह के कई धार्मिक , दार्शनिक , मनोगत (Occult) और रहस्यवादी (Mystic) समूह और उनके ठिकाने का पता लगाया. वह सांस्कृतिक आंदोलनों और ईसाई , असीरियन , अर्मेनियाई, इस्लामी और पारसी (ज़रथुस्‍ट्र पंथ) की मूल की परंपराओं के रीतिरिवाज और उनके संगीत से बहुत प्रभावित थे.
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गुरजिएफ का जन्म एक ऑर्थोडॉक्स ईसाई परिवार में हुआ था. उन्होंने ईसाई धर्म के गूढ़ ज्ञान और उनके अनुष्ठानों को भी सीखा .फिर भी वह पूरी तरह से संतुष्ट नहीं थे. फिर भी वह अपने बुनियादी सवाल को समझ नहीं सके और इसे हल नहीं कर सके. और वह ज्ञान की खोज में बाहर निकल गए. गुर्जिएफ़्फ़ 15 या 20 पुरुषों और एक महिला के एक सत्य शोधक समूह में शामिल हो गए. सभी सत्य कि तलाश में थे. वे सब एक-साथ या अलग समूहों में या कभी-कभी अकेले यात्रा करते थे. वे मिस्र , क्रेते , सुमेरियन , अश्शूर और पवित्र भूमि में प्राचीन सभ्यताओं की खोज के लिए गये . उन्होंने मठों और समारिया का दौरा भी किया. आगे जाके उनको बुद्धिमान पुरुषों के प्राचीन भाई-चारे, ‘द सरमन ब्रदरहुड’ के बारे में पता चला, तो उनका भी संपर्क किया. उन्होंने मध्य एशिया के केदिरी दरवेश (Kediri dervishes) का दौरा भी किया. उन्होंने ज्ञान की खोज में किसी भी तरह से साइबेरिया के उत्तरी घाटियों का भी दौरा किया. कैसे भी किसी भी तरह , जहाँ भी सुना ,की कुछ है , वहाँ सब जगह वो भागे , जहाँ भी थोड़ी भी ज्ञान पानेकी संभावना बनी थी.
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गुरजिएफ अभ्यास करके एक विशेषज्ञ हिप्नोटिस्ट बन गये थे. उनकी सुझाव के प्रकारों में दिलचस्पी थी.
उन्होंने यह भी सीख लिया था कि मानव शरीर में ऊर्जा को कैसे ध्यान में रूपान्तरित किया जाय. उनकी, किसी भी व्यक्ति के संभव चेतना की स्थितियों में ज्यादा रूचि थी. उन्होंने चेतना को संशोधित करने के लिए संगीत, कला , मुद्रा और भाव की मदद ली. प्राचीन सभ्यताओं में उनकी गहरी दिलचस्पी थी. वह बेबीलोन गए. जो लोग दुनिया के प्राचीन सभ्यताओं को जानते थे और समझते थे, उनके के साथ गुर्जिएफ़्फ़ का गहरा मानसिक लगाव हो गया था.
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गुर्जिएफ़्फ़ एक अच्छा संगीतकार था और संगीत की धून तैयार करनेमे काफी निपूर्ण था, वह ऐसा धून बनता था की वह सुनते ही आदमी ध्यान में चला जाये. ये धुन सभी श्रोताओं में जागरूकता और ध्यान के समान भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को उत्पन्न कर सकते हैं. गुर्जिएफ़्फ़ चाहता था की मकान या इमारतों तो निर्माण भी इस प्रकार होना चाहिए कि सिर्फ उनके भीतर प्रवेश करने से होश या जागरूकता या ध्यान पैदा किया जा सकता था. और एक जमाना था जब ऐसा मकान या घर बनता था , की जिसमे सिर्फ प्रवेश मात्र से ध्यान लग जाता था. और गुरजिएफ ने नृत्य को इस ढंग से कोरिओग्राफ किया था कि नृत्य करने वाले के मन के भीतर की स्थिति ध्यानातीत की जा सकती थी. गुरजिएफ ने विभिन्न क्षेत्रों से इन पवित्र नृत्यों को एकत्र किया था. उससे, उन्हें मानव शरीर और मन के रहस्यों की कुंजी का पता चला .
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उन्होंने यह भी पाया कि हर अनुष्ठान या संस्कार का भी एक मूल्य है और यदि यह ध्यान और जागरूकता के साथ किया जाये तो उसका काफी असर होता है. गुरजिएफ ने कहा है कि सभी संस्कार जागरूकता की सैकड़ों विधियों से युक्त हैं….
गुरजिएफ का असल आंतरिक विकास हुआ, जब वह इस्लामी धर्म की एकमात्र जीवित शाखा,.सूफी धर्म के साथ संपर्क में आये. उन्होंने इस्लामी दुनिया के ध्यान के अनुष्ठान सीखा. उन्होंने अफगानिस्तान में दरवेश ध्यान का प्रशिक्षण लिया. वह हिंदू कुश के मठ में साक्षी भाव से पृथक बनके रहने लगे. उन्होंने मक्का की तीर्थयात्रा की और निराश हुए. उन्होंने देखा कि वहां कोई भी होशपूर्वक या ध्यान में नहीं था. उन्होंने अपने छात्रों को बताया कि यदि आप ध्यान सीखना चाहते हैं तो बोखारा जाइये, मक्का मत जाइये. एनाग्राम के केंद्रीय प्रतीक की खोज भी सूफी और ईसाई लोगों ने की थी.गुर्जिएफ़्फ़ उनकी शिक्षाओं और सिस्टम में दरवेश के पवित्र नृत्य के महत्व को इंगित करता है, जिसे गुरजिएफ ने विकसित किया.
गुरजिएफ हमेशा अपनी जेब में पैसे के बिना ही यात्रा करते थे. वह कुछ दिनों के लिए ठहरते थे, पैसे कमाते थे और आगे बढ़ जाते थे. गुर्जिएफ़्फ़ ने पैसे कमाने के लिए पर्यटक के लिए गाइड के रूप में काम किया. उन्होंने हिप्नोटिस्ट के रूप में काम किये. उन्होंने एक रूसी जासूस के रूप में काम किया. उन्होंने कालीन का व्यापार किये. उन्होंने मशीनों की मरम्मत की. उन्होंने गौरैयों को रंग लगाके , अमेरिकन कनेरिएस बनाके बेचा. उन्होंने जादूगर के रूप में काम किया. यह सब उन्होंने अपनी किताब “meeting with a remarkable man” में एक काव्यात्मक तरीके से उल्लेख किया है.
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गुरजिएफ ने उस अवधि में कई बार मृत्यु का अनुभव किया और भाग्यशाली रहे. एकबार उन्हें तीन गोलियां लगीं, लेकिन बच गए. इस अवधि के दौरान जागरूक रहे और मृत्यु के साक्षी बने. 1896 में, वह घातक रूप से घायल हुए. और वह ज्यादा समय कोमा में ही रहे. उनका शरीर तो कोमा में था , लेकिन भीतर से वह जागृत थे , होश में था . ये ऐसा ही था जैसे रमण महर्षी भी लम्बे समय तक कोमा में रहे लेकिन भीतर से जागरूक बने रहे थे. फिर दूसरी बार उन्होंने बहुत निकट से मौत का अनुभव किया; जिसने उन्हें जागरूक, ध्यानी और निडर बना दिया.
गुरजिएफ ने चारों ओर से गूढ़ ज्ञान एकत्र किया. उन्होंने भारत की यात्रा की और तिब्बत गए. यहां तिब्बत में उन्होंने लामाओं से सभी ध्यान के तरीकों को सीखा. उन्होंने लामाओं से बुद्ध का तर्क भी सीखा, जो कि उनके लिए आगे यूरोपीय देशों में उनके शिष्य को शिखाने में बहुत उपयोगी रहा. वह लामाओं के जैसे लाल रंग का वस्त्र पहना करते थे. वह कुछ समय तक दलाई लामा के शिक्षक भी रहे. उनका शिक्षण बौद्ध और सूफी संगीत की परंपराओं से प्रभावित था. गुरजिएफ ने एक प्रमुख रूसी गुप्त एजेंट के रूप में काम किया था या नहीं, इसमें संदेह है. लेकिन कहा जाता है कि वहां उन्होंने दस साल के लिए काम किया था. उन्होंने सेना के उपकरणों की देखरेख की थी .
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ओशो की तरह, गुरजिएफ को भी नृत्य और संगीत और पवित्र मूवमेंट्स में दिलचस्पी थी. उन्होंने तिब्बत से और सूफियों से सभी आध्यात्मिक और पवित्र लोक नृत्य एकत्र किया है. उन्होंने यूरोप और अमेरिका में कई पवित्र नृत्य का प्रदर्शन किया. उन्होंने तिब्बत से हठ योग भी सीखा था. वह दस मील
की दूरी से एक याक को निर्देशित करने में सक्षम थे. उन्होंने हठ योग से इतनी ऊर्जा प्राप्त कर ली थी कि वह एक हाथी को सुला सकते थे.
गुरजिएफ ने तिब्बत में अपना शोध और ध्यान जारी रखा. इस समय तक वह एक अन्य दुर्घटना के शिकार हुए. आम तौर पर यह सभी बौद्ध व्यक्ति के साथ होता है; उनको लगभग हर सातवें साल में अपने शरीर के साथ कुछ न कुछ समस्या झेलनी पड़ती है. ओशो और कृष्णमूर्ति को भी गुरजिएफ की तरह ही अनुभव हुआ था. लेकिन तिब्बत में इस बार, गुरजिएफ लगभग प्राणघातक रूप से एक गोली से घायल हो गए थे. लेकिन कुदरत को उन्हें बचाना था , और ऐसे ही हुआ , उसके साथी उन्हें घायल हालत में भी छिपाने में कामयाब रहे. वहाँ उन्होंने कोमा में, कई महीने बिताए और पांच चिकित्सकों, तीन यूरोपीय और दो ​​तिब्बती की सेवा द्वारा उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ. इस समय के दौरान उन्होंने ओशो और कृष्णमूर्ति की ही तरह होश के साथ मौत की अवस्था का अनुभव किया. पहली बार वह अपने शरीर से पृथक हो गए थे. और उन्होंने अपने खुद के शरीर को दूर पड़ा देखा. उन्होंने इसे साक्षीभाव से देखा. उन्होंने अमरता का अनुभव किया, इस घटना ने उन्हें प्रबुद्ध व्यक्ती या क्राइस्ट या भगवान बनाया.
उन्होंने यहाँ पर असाधारण शक्तियों का विकास किया. अचानक वह बिलकुल निष्क्रिय हो गए और पूर्ण आराम में चले गए. उन्हें एक बादल गरजने के झटके जैसा एहसास हुआ. अभी वह बुद्ध हो चुके थे.
अंतिम प्रयास भी उन्होंने छोड़ दिया. वह अस्तित्व को आत्मसमर्पित हो गए. उनको एहसास हुआ कि उनके पास वे सभी संभावनाएँ और असम्भावनाएँ हैं, जो भगवान के पास है.
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उसके बाद, उन्होंने रूस के राजा ज़ार निकोलस द्वितीय के साथ कुछ समय बिताया; क्योंकि ज़ार रहस्यमय चीजों के बहुत वशीभूत था. यहां उन्होंने महल की एक महिला काउंटेस ओस्त्रोसका, ज़ार की चचेरी बहन, से शादी की.
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गुरजिएफ ने 1915 में उपदेश देना शुरू कर दिया था. वे सेंट पीटर्सबर्ग में और मास्को में छात्र-समूह को सिखा रहे थे. यहां गुर्जिएफ़्फ़ को पीटर आस्पेंस्की मिला, जो आदमी, उनके लिए सुकरात के प्लेटो की तरह बन गया. आस्पेंस्की भी बस अपनी वास्तविक गूढ़ ज्ञान की खोज की यात्रा से लौटा ही था. और उसे एक ऐसा गुर्जिएफ़्फ़ जैसा जागरूक गुरु की तलाश थी, और ओस्पन्स्की , गुर्जिएफ़्फ़ को अपने ही गृहनगर में, उसे पाकर वह अचंभित रह गया.
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रूस में उस समय आस्पेंस्की को अच्छी तरह से जाना मना जाता था. उसने कई पुस्तकें लिखी थीं. और उसकी पुस्तकें बहुत अच्छी तरह से पूरी दुनिया में जानी जाती थीं. और कोई भी उस समय गुरजिएफ को नहीं जानता था. यहां तक ​​कि गुरजिएफ के पास भी बोलने या व्यक्त करने के लिए परिष्कृत भाषा भी नहीं थी. उसने गुरजिएफ के साथ चेतना के सभी स्तरों, मानव की स्थिति, मृत्यु और अमरता, और स्वयं में बोध की संभावना के बारे में बहुत चर्चा की.
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तो आस्पेंस्की गुरजिएफ के शिष्यों के एक छात्र समूह में शामिल हो गए जो मास्को में गुप्त रूप से मिलते थे, और उनके साथ तबतक काम किया जब तक कि समूह क्रांति के खतरे के तहत बंद नहीं कर दिया गया.
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ओल्गा डे हार्टमैन एक बहुत प्रसिद्ध संगीतकार 1917 में गुरजिएफ के समूह में शामिल हो गए. 1917 में रूस, युद्ध और क्रांतियों से पूरी तरह उजड़ गया था. श्री गुरजिएफ एक अज्ञात रहस्यमय व्यक्ति थे. कोई भी उनके शिक्षण के बारे में नहीं जानता था; किसी को भी वह कहाँ से और क्यूँ आया उसका का पता नहीं था और वह मास्को और सेंट पीटर्सबर्ग में क्यों दिखाई देता है वह भी पता नहीं था. लेकिन जो कोई भी उनके संपर्क में आता था वह उनका हो जाता था , और उन्हें उनुगमन करने लगता था. मोस्को और सेंट पीटर बर्ग में काम करना मुश्किल बन चूका था , तो गुरजिएफ के बहुत से छात्रों ने, मिस्टर और मिसेज हार्टमैन और मिस्टर और मिसेज आस्पेंस्की के साथ मोस्को से दूर ईंस्तुकी गए और वंहा साधना शुरू की. ईंस्तुकी में गुरजिएफ ने अपने छात्रों को उपदेश देना और ध्यान शिखाना शुरू कर दिया. फिर, वह क्षेत्र में भी युद्ध चालू होने के कारण साधना करना समस्याग्रस्त हो गया, इसलिए वे सभी टिफलिस के लिए चले गए .वंहा भी कोमुनिस्ट रेवोलुश्नारी पहोंच गए , जो उनके लिए खतरा बन गए . वंहा सभी सबको भागना पड़ा . फिर गुर्जिएफ़्फ़ का काफला सीधे जर्मनी होके तुरकी पास करके फ्रान्स पहुंचे .
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यहाँ फ्रान्स से अलेक्जेंडर और जीन डे सल्जमन सहित कई अन्य छात्र गुरजिएफ के स्कूल में शामिल हो गए. और वे सब एक साथ मिलकर एक नया छात्र समूह शुरू किया, और गुर्जिएफ़्फ़ के निर्देशन में ध्यान करनाशुरू किया . यहाँ पेरिस से कुछ चालीस किलोमीटर दूर गुरजिएफ ने बसने का फैसला किया और एक वर्ष के भीतर ही एवन के महल नामक स्थान को खरीदने के लिए आवश्यक धन एकत्र कर लिया. यहाँ वह व्यक्ति के सामंजस्यपूर्ण विकास और ध्यान के प्रयोग करवाने के लिए एक संस्थान की स्थापना की, जीन का नाम उन्होंने “हर्मोनिऔस डेवलपमेंट ऑफ़ ह्यूमन बीइंग” रखा.
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यहां उन्होंने छात्रों के साथ संस्थान में कठिन काम करते हुए 1922 से 1933 तक पूरे दस साल बिताये; इस दौरान गुरजिएफ ने अध्ययन और ध्यान के तरीकों को उनके छात्रोके स्वाभाव के हिशाब से संशोधन किया. वह स्वयं का अवलोकन करने, अत्मस्मरण, ध्यान और शारीरिक श्रम का अभ्यास देते थे. वह तीनों मुख्य केंद्र भावना, विचार और गति के सामंजस्य पर जोर देते थे.
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कई शिष्य संस्थान में ठहरने के लिए आये. काथरिन मन्सफील्ड (जिनकी यहीं मृत्यु हो गयी थी), ए. आर. ऑरेंज, मौरिस निकोल और डी साल्जमन सभी अलग-अलग क्षेत्रों से आये. गुरजिएफ ने श्रेष्ठता के अनुसार कोई भी भेद-भाव नहीं किया था. और जो कोई भी उनके साथ अध्ययन के लिए आता था, उनको कठिन मेहनत करने के लिए निश्चित होना पड़ता था. और उसको गुरजिएफ का अहंकार पर एक अलग कार्य करने के तरीके से भी जूझना पड़ता था. उनके संस्थान में सब कार्य होश से करने की साधना थी., ध्यान शिखने का पूरा मोका , और व्यक्तिगत स्वाभाव को ठीक करने के लिए हर क्षण होश में रहेना शिखना एक अवसर था. सभी को होश के साथ साफ-सफाई, झाड़ू-पोछा, खाना बनाना, कपड़े धोना पड़ता था. वह भोजन के समय शिक्षा या उपदेश दिया करते थे.
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यहाँ पर गुरजिएफ ने अपने छात्रों पर बहुत प्रयोग किये. एक बार, उन्होंने 30 छात्रों को एक बंगले में सभी सुविधाओं के साथ रखा. वे लोग भोजन और अन्य सब कुछ समय-समय पर पाते थे. उन्होंने सभी तीस छात्रों से कहा कि, उन्हें बंगले में उसी तरह से रहना है, जैसे कि वे अकेले रह रहे हैं. कल्पना कीजिए कि बंगले में आपके सिवाय और कोई भी नहीं है. आपको किसी और को नहीं देखना है, क्योंकि वंहा कोई और है ही नहीं. अगर आपसे किसी को लग जाता है तो दुःख महसूस करने या कहने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्यों कि वंहा कोई है ही नहीं. सभी को मौन रहना है जैसे कि कोई बात करने के लिए वहां नहीं है. और सभी को हमेशा पूर्ण होशपूर्वक रहना है. यदि कोई किसी को कुछ इशारा करते हुए पाया जाता था, तो गुरजिएफ उसे बाहर कर देता था. तीन दिन के बाद उस बंगले में छात्रों को घुटन महसूस होने लगी. कई बाहर आने लगे. तीसवें दिन बंगले में केवल तीन छात्र बचे. लेकिन वे तीनों अलग व्यक्ति हो चुके थे. पहली बार वे पूर्णरूप से अहंकार मुक्त और होशपूर्वक हो गए थे. उनकी आँखे अलग हो गयी थीं. उनकी चाल बदल गयी थी.
कठिन कार्य की यह अवधि, जिसमें गुरजिएफ के व्याख्यान और प्रदर्शनी भी शामिल थे, अमेरिका और यूरोप में चल रहे थे. 1925 में गुर्जिएफ़ की एक बहुत घातक कार दुर्घटना हुई. या दुर्घटना उस समय हुई जब वह अपनी पहली अमेरिका की यात्रा से लौट रहे थे. गुरजिएफ अकेले एक छोटे से सीट्रोन कार में सफ़र कर रहे थे. अब यहाँ पर एक विवाद है कि जब वह पूर्ण होश में थे तो कार दुर्घटना कैसे संभव हुई. लोग यह भी कहते हैं कि उन्होंने यह कार दुर्घटना जान बूझकर की. वह देखना चाहते थे कि उनकी शरीर को क्या होता है और क्या वह अपनी इच्छा शक्ति से वापस अपने शरीर को ठीक कर सकते हैं या नहीं, चिकित्सक उनको इतनी तेजी से ठीक होते हुए देखकर अचंभित रह गए थे.
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गुर्जिएफ़्फ़ ने बाद में अपना पूरा ध्यान लेखन की ओर करना शुरू किया और अंत में उन्होंने तीन बड़ी पुस्तकें समाप्त कीं. यह All and Everything, और दूसरी “Meeting with Remarkable Man” और तीसरी Life is Real Only Then, When “I Am” थीं….. ये पुस्तकें गुर्जिएफ़ के कार्य में बहुत महत्वपूर्ण हुईं.
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पहली पुस्तक में बिना किसी दया के, बिना किसी समझौते के, जो कुछ भी व्यक्ति के मन में विचार का जो कचरा पड़ा है और फिर उसकी सभी अच्छी और बुरी जो भी भावनाओं को जाल ,और अंध विश्वास को, और अपना बनाया हुआ , या प्रसेक्षण किया हुआ दृष्टिकोण को कैसे समाप्त किया जाय, है, जो व्यक्ति के जीवन में सदियों से है और इसकी जड़ गहराई तक है.
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दूसरी पुस्तक में नयी वस्तु बनाने के लिए आवश्यक सामग्री कैसे जुटाएं और इसके गुण और बेहतरी को कैसे सिद्ध करें, है.
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तीसरी पुस्तक में व्यक्ति में उगते हुए ध्यान को , या एहसास को कैसे सहारा दें, और कैसे ध्यान को वंहा तक लेके आये की वंहा से वापस गिरनेकी संभावना समाप्त हो जाए.
पेरिस में, 1949 में गुरजिएफ की मृत्यु हो गयी. जिस दिन उनकी मृत्यु होने की थी, उस दिन सुबह में उन्होंने एक स्ट्रांग कॉफ़ी ली, फिर एक सिगार सुलगाया और उसे पिया और फिर एक एम्बुलेंस बुलाया. वह एम्बुलेंस में बैठे और पेरिस के एक अस्पताल में गए, वह बस बिस्तर पर लेट गए और अपने कुछ खास शिष्यों की उपस्थिति में शरीर को त्याग दिया….
🌺💐🌹🌷🌼🌸 Sw Jeetu 🌹
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